संजय दत्त की कहानी उऩकी मां नरगिस की जुबानी, डरी हुई मां फिक्रमंद थी बाबा को लेकर

संजय दत्त की कहानी उऩकी मां नरगिस की जुबानी, डरी हुई मां फिक्रमंद थी बाबा को लेकर, 29 जुलाई 1959 को संजय के पैदा होने के बाद नरगिस ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनका दुलारा बेटा ज़िंदगी भर किन-किन आड़े-तिरछे रास्तों से गुज़रेगा। नरगिस और सुनील दत्त का बेटा संजय। फ़िल्म्स डिवीजन की डॉक्युमेंट्री में जब माँ नरगिस संजू को तैयार कर चूमती तो वो शरमाकर मुंह छिपा लेता है।

छोटा संजू कैमरे की तरफ़ नहीं देखता था, लेकिन बाद के दिनों में उसने ज़िंदगी भर कैमरे के सामने रहना चुना। एक रेडियो इंटरव्यू में नरगिस ने बताया था, “संजय के पैदा होने के बाद मैं जब शूटिंग के लिए जाती तो वो रोने लगता। स्टूडियो में मैं भी फ़िक्रमंद रहती कि वो ठीक तो होगा। इसलिए मैंने फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ने का फ़ैसला किया”।

संजू को बिगड़ता देखकर उन्हें मुंबई के कैथेड्रल स्कूल से निकाल कर हिमाचल प्रदेश के मशहूर बोर्डिंग स्कूल ‘सेंट लॉरेंस’ भेज दिया गया। संजय के अगले कुछ साल वहीं बीते। संजय दत्त को बचपन में म्यूज़िक का शौक था। वो स्कूल की बैंड में सबसे पीछे ड्रम बजाते हुए चलते थे। 1977 में संजय लॉरेंस स्कूल से 18 बरस की उम्र में घर लौटे। संजय का दाख़िला मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज में करवाया गया।

यही दौर था जब संजय दत्त ड्रग्स की अंधेरी गली में मुड़ गए, उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे अपने कमरे में बंद रहते थे।नरगिस को शायद अंदाज़ा था कि उनका बेटा संजय दत्त ड्रग्स लेने लगा है लेकिन उन्होंने इसका ज़िक्र सुनील दत्त से नहीं किया। संजय दत्त ने तय कर लिया कि वो फ़िल्मों में करियर बनाना चाहते हैं। वैसे संजय बड़े पर्दे पर पहली बार 1971 में ‘रेशमा और शेरा’ फ़िल्म में बाल कलाकार की तरह दिखे थे।

बहरहाल, सुनील दत्त ने उनकी ट्रेनिंग करवाई। जब संजय फ़िल्मों के लिए तैयार हो गए तो उन्होंने ‘रॉकी’ फ़िल्म में संजय को बतौर हीरो लिया और टीना मुनीम को हीरोइन। फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई। जब ‘रॉकी’ की शूटिंग चल रही थी उसी दौर में पता चला कि नरगिस को कैंसर है, इलाज के लिए सुनील दत्त उन्हें अमरीका ले गए। दो महीने कोमा में रहने के बाद जब उन्हें होश आया तो उन्होंने आँखें खोलते हुए पूछा- “संजय कहाँ है?”

अस्पताल में सुनील दत्त नरगिस की आवाज़ रिकॉर्ड किया करते थे। उन्होंने अपने बेटे संजू के लिए ऑडियो मैसेज अस्पताल में रिकॉर्ड किया था। कुछ वक्त बाद तबीयत कुछ ठीक होने पर नरगिस भारत लौट आईं। संजय की पहली फ़िल्म की शूटिंग ज़ोरों पर थी। नरगिस ने सुनील दत्त से कहा था- “चाहे जैसे करिए, मुझे मेरे बेटे की फ़िल्म प्रीमियर में जाना है। स्ट्रेचर या व्हीलचेयर जो भी हो”।

सुनील दत्त ने सारी तैयारी कर भी दी थी। 7 मई 1981 को ‘रॉकी’ का प्रीमियर होना था। लेकिन नरगिस की तबीयत फिर बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनका शरीर जवाब देने लगा। 3 मई 1981 को नरगिस ने दुनिया को अलविदा कह दिया यानी ‘रॉकी’ के प्रीमियर से चार दिन पहले।

संजय दत्त ने एक इंटरव्यू में बताया था कि माँ की मौत के बाद वे बिल्कुल नहीं रोए थे। सुनील दत्त ने बताया था कि ‘रॉकी’ के प्रीमियर के दिन सिनेमा हॉल में एक कुर्सी खाली रही। किसी ने आकर ‘दत्त साहेब ये सीट खाली है’। इस पर उन्होंने कहा था- ‘नहीं, ये मेरी पत्नी की सीट है’। रॉकी रिलीज़ हुई और लोगों को पसंद भी आई।

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