अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश जी जब नीरज जी से कम फीस मिलने पर नाराज़ हो गए थे

डॉ राम श्रीवास्तव जी की कलम से संस्मरण

अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश जी जब नीरज जी से कम फीस मिलने पर नाराज़ हो गए थे, बात पिछली शताब्दी के छटवे दशक की शुरूआत की थी । उन दिनों बड़े कालेजों में कवि सम्मेलनों का रिवा़ज चलन बहुत होता था । ऐसे ही एक कविसम्मेलन में गोपालदास नीरज, काका हाथरसी, हरिवंशराय बच्चन आदि नामी कवि पधारे थे ।

मेरी ड्यूटी इन कवियों की सेवा खातिर में अक्सर लगती रहती थी । कवियों को करीबी से देखने, उनकी परस्पर चुहुलबाजी देखने में मजा आता था । यह जानकर मुझे अचम्भा और थोडा अजीब भी लगता था कि कुछ कविराज जो मंच पर तालियों की गड़गड़ाहट में वाह -वाह के ठुमकों के साथ चमकते रहते थे , उनमें से कुछ बड़े नाम ऐसे भी होते थे ,जो मंच पर जाने के पहिले और बाद में दो तीन पैग जाम के जरूर लगाते थे ।

मैंने अपने जीवन में दारू के सर्व प्रथम दर्शन उस समय किये थे , जब एक ऐसे ही कविराज की मॉगपर मुझे “सोम रस” को खरीद कर लाना पड़ा था । मैंने अपने जीवन में दारू, शराब,जा़म आदि आदि को आज तक भी चखकर नहीं देखा है ; पर चूंकि कवियों की सेवा खातिर में मेरी ड्यूटी थी , तो इन कवि देवता के सुरों में राग उतारने के लिये इनमें से कुछ को जाम बनाकर देना पड़ते थे ।

मुझे मेरे क्लासफेलो बाल कवि बैरागी का अच्छी तरह याद है ,जब नीरज जी के बहुत कहने पर भी उनने जाम नहीं चखा । जाम का दौर जब रात को तीन सवा तीन बजे कविसम्मेलन की समाप्ति के बाद होता था तो, मुझे कविराजों को विश्राम कराने के लिये होस्टल में और खाली बंगले में किये गए विश्राम कक्ष में ले जाना पडता था ।

उन दिनों होटल लॉज कालेज से दूर होने के कारण और आने जाने के लिये रात में तॉगा नहीं मिलने के कारण नीरज , काका जैसे कवियों को होस्टल के लोहे के पंलगों पर ही सुलाया जाता था ।

कविराजों को विदा करने के पूर्व उनके टिकिट का आने जाने का खर्चा और मेहनताना लिफाफे में बन्द करके कागज पर दस्तखत कराकर सौंपने की मेरी ड्यूटी लगती थी । अक्सर एक कवि को कितने रूपये दिये हैं , दूसरे को बताने में हम झिझकते थे ।

पर जब हरिबंश राय जी बच्चन को , गोपालदास नीरज से पांच सौ रूपये कम मिले तो बच्चन जी खफा हो गए , बडबडाहट में उनके चेहरे का बडा सा दिखने बाला मस्सा भी गुस्से में कॉपने लगा था। जब मैंने अपनी मजबूरी बताते हुए क्षमा याचना की तो पहिले बह दुखी हुए और चुपचाप बाद में नाराजी से लिफाफा हाथ में लेकर बंडी की जेब में ठूंस लिया ।

आज इतने साल के बाद मुझे यह किस्सा इस लिये याद आ गया , जब मैंने यह समाचार सुना कि जया बच्चन ने राज्य सभा का सदस्य चुने जाने के लिये समाजवादी पार्टी के टिकिट पर नामांकन पत्र भरा। नियम के अनुसार उन्होने खुद की और पति की चल अचल सम्पति की जानकारी दी है ।

पता चला कि पॉच साल पहिले जब बच्चन दम्पति की सम्पति ४९३ करोड़ थी, आज उनकी चल अचल सम्पति एक हजार करोड़ रूपये हो गई है । उनके बम्बई में आलीशान मकान के अलाबा फ्रांस में ३४१७५ वर्ग फुट का समुद्र किनारे का महल है , अहमदाबाद, भोपाल,गॉधीनगर,नोयड़ा, पुणे में अचल सम्पति है, यू पी में खेती की जमीन हैं , उनके पास तीन मर्सीडीज कार सहित रेन्ज रोबर, रोल्स रॉयल तथा अन्य बहुत उम्दा एक दर्जन कारें हैं।

अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की सम्पति की जानकारी के बाद , पता नहीं क्यों मुझे उनके पिताजी श्री हरिवंश राय बच्चन जी का गुस्से में भरा और दुखी मन का बह चेहरा बार बार , आंखो के सामने घूम रहा है ,,,,सच ही यही तो कहते हैं “किस्मत का खेल “ , कैसा समय था ,जब पिता पॉच सौ रूपये कम मिलने पर ‘खिन्न ‘हो गये थे ,और आज बेटा हजार करोड़ में डोल रहा है ।

ये लेखक के अपने निजी विचार हैं।

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