टिस्का चोपड़ा ने कहा फीचर फिल्मों का स्टार्टअप साबित होंगी शॉर्ट फिल्में

टिस्का चोपड़ा ने कहा फीचर फिल्मों का स्टार्टअप साबित होंगी शॉर्ट फिल्में , ‘शार्ट फ़िल्म ‘चटनी’ को लेकर कुछ लोगों के मन में संशय था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उसमें अभिनय के साथ मैं निर्माण में क्यों जुड़ी हूं। उसकी सफलता ने सभी के सवालों का जवाब दे दिया।  उनका मानना है कि सिनेमा में करियर बनाने वालों के लिए शार्ट फ़िल्म स्टार्टअप की तरह है। फीचर फ़िल्म की ओर कदम बढ़ाने के लिए शार्ट फ़िल्म बेहतरीन प्लेटफार्म है। वो अपने निर्माता बनने के राज खोलती हैं- ‘मैं निर्माता इसलिए बनी ताकि अलहदा किरदार निभा सकूं। निर्माता बनने के बाद पर्दे के पीछे की मुश्किलें समझ आई हैं। ‘चटनी’ में मैंने कई गलतियां कीं। मसलन ज्यादा पैसा खर्च नहीं किया। मुझे लगता है कि मैं उसे ज्यादा बेहतर बना सकती थी।‘

हिंदी सिनेमा में काफी बदलाव आया है। हालांकि बच्चों की फ़िल्मों में फिल्ममेकर ज्यादा रुचि नहीं लेते। लेते भी हैं तो फ़िल्में प्रभाव छोडऩे में नाकामयाब रहती हैं। टिस्का को भी बाल फ़िल्मों की कमी अखरती हैं। वह कहती हैं, मेरी साढ़े चार साल की बेटी है। वह सिर्फ हॉलीवुड की फ़िल्में देखती है। दरअसल, हमारे देश में बच्चों लायक सेंसबिल कंटेंट नहीं है। हम अपने बच्चों को मासूम और भोला समझते हैं। जरूरत बच्चों के हिसाब से कटेंट देने की है।

हिंदी सिनेमा में निर्देशन या फ़िल्म निर्माण में चुनिंदा महिलाएं ही सक्रिय हैं। यह हालात कमोबेश दुनिया के सभी हिस्से में हैं। लैंगिक समानता के मामले में पश्चिमी देश अग्रणी हैं। बावजूद इसके जेनिफर लारेंस समेत कई हॉलीवुड अभिनेत्रियों ने फीस में असमानता को लेकर अपनी आवाज बुलंद की है। लिहाजा यह समस्या विश्वव्यापी है। टिस्का अपने देश की हालत पर तल्ख सवाल खड़े करती हैं और पूछती हैं कि काम में लैंगिक आधार पर विभाजन क्यों? निर्देशन में महिला निर्देशक संबोधित होता है। यह भेदभाव क्यों? काम तो वह भी वही कर रही है जो पुरुष निर्देशक कर रहा है। यही नहीं कहानियों को भी महिला-पुरुष के खांचे में डाल दिया जाता है ।