सुंदरकांड | वेब फिल्म जो कहती है इश्क की अनोखी दास्तां

सुंदरकांड एक ऐसी वेब फिल्म है जो इश्क के लिए, इश्क के दरमियां बुनी गई है। मोहब्बत करना आसान होता है लेकिन निभाना बहुत मुश्किल और ये फिल्म इस कैनवस पर अपनी भावनाओं के रंग बिखेर रही हैं। फिल्म की डायरेक्टर श्रेया रस्तोगी से गॉसिपगंज के एडिटर मधुरेंद्र पाण्डे ने बातचीत की। पेश है उसके कुछ अंश…

मधुरेंद्र पाण्डे – श्रेया रस्तोगी जी आपका स्वागत है। पहले तो ये बताइये कि इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे उठाई? मेरा मतलब डायरेक्शन से है।

श्रेया रस्तोगी – मैं 4 साल पहले मुंबई आई थी डायरेक्शन का कोर्स करने के लिए। कोर्स नहीं हो पाया लेकिन ज़ेहन में एक ख्वाहिश थी कि डायरेक्शन करना है। लखनऊ में मैंने ईटीवी औऱ दूरदर्शन के लिए एंकरिंग की थी तो स्टूडियो डायरेक्टर का काम मुझे अच्छा लगता था क्योंकि उनसे जो इंस्ट्रक्शन मिलती थी उसी के मुताबिक मुझे एंकरिंग करनी होती थी। बस मुझे लगा कि अब मुझे डायरेक्टर बनना है वो भी न्यूज़ का नहीं बल्कि फिल्मों का।

मधुरेंद्र पाण्डे –  चलिए आपने ठान लिया था कि आपको डायरेक्टर बनना है। इसकी शुरुआत कैसे की आपने क्योंकि मुंबई कोई आसान जगह तो है नहीं।

श्रेया रस्तोगी – मुझे लगा कि अगर मैं प्रोडक्शन हाउसेज में एडी के तौर पर काम शुरु करूं तो मेरे सपने पूरे हो सकते हैं। बस वहीं से शुरुआत की और फिर धीरे धीरे डायरेक्शन की बारीकियां सीख गई।

मधुरेंद्र पाण्डे –  सतीश राममूर्ति जी से आपकी मुलाकात कैसे हुई और फिल्म फिल्म सुंदरकांड फिल्म पर काम कैसे शुरु हुआ?

श्रेया रस्तोगी – मुझे डायरेक्शन ही करना था ये तो तय था। इस दौरान जब सतीश सर से मुलाकात हुई तो फिल्म की कहानी सुनी। मैंने तुरंत उनसे कहा कि मैं ये फिल्म डायरेक्ट करना चाहती हूं। सतीश सर ने भी सोचा कि इतने कम उम्र में मैं डायरेक्शन कैसे कर पाऊंगी। मैंने भी सोच लिया कि चलो करते हैं अगर कुछ गलत हुआ तो सीनियर्स उसे सुधार देंगे। लेकिन मुझे ये काम करना ही है। आपको बताऊं सतीश सर ने मुझे बहुत सपोर्ट किया। वो इतने अच्छे से गाइड करते हैं कि पूछिए मत।

मधुरेंद्र पाण्डे – चलिए आपने फिल्म के डायरेक्टशन की ज़िम्मेदारी ले ली तो इसके लिए लोकेशन कैसे और कहां कहां सेलेक्ट की?

श्रेया रस्तोगी – देखिए सुंदरकांड का कॉन्सेप्ट ऐसा था कि जिसके लिए हमें कई लोकेशन्स चाहिए थी। एक ट्रैवलॉग की तरह ये पूरी फिल्म है। इससे लिए हम लोगों ने मुंबई, पुणे, दमन, बैंगलुरू, चेन्नई और लखनऊ को चुना। एक बात और कि इस फिल्म का कुछ हिस्सा अमेरिका में भी शूट किया गया है।

मधुरेंद्र पाण्डे – फिल्म शूट करने के दौरान क्या- क्या मुश्किलें आपके सामने आईं?

श्रेया रस्तोगी – फिल्म की शूटिंग के लिए 4K कैमरा चाहिए होता है। हमने टीम भी इकट्ठी कर ली थी। लेकिन सबसे बड़ी प्रॉब्लम बजट की थी। कैमरामैन भी मिल गए थे लेकिन हमें वो आउटपुट नहीं मिल पा रहा था जो हमें चाहिए था। फिर मैंने सतीश सर को बोला कि चलिए इसे मोबाइल से शूट करते हैं और आईफोन 7 प्लस से पूरी फिल्म शूट कर डाली। मैं आपको बताउं कि किसी को पता ही नहीं चलेगा कि ये 4के कैमरे से शूट किया है या मोबाइल से। लोग जो बड़े- बड़े कैमरे से आउटपुट देते हैं वो मैंने एक फोन से किया है।

मधुरेंद्र पाण्डे – चलिए लेकिन मोबाइल से फिल्म शूट करना तो काफी मुश्किल होता होगा। है ना?

श्रेया रस्तोगी – मोबाइल से फिल्म शूट करना… मुश्किल तो होता है, नो डाउट लेकिन इसके कई फायदे भी हैं जैसे आपको लोकेशन के लिए परमिशन नहीं लेनी पड़ती। आप मोबाइल से कहीं भी शूट कर सकते हैं। हां कहीं- कहीं सिक्योरिटी प्रॉब्लम करती है जैसे दमन में हमें शूट करने से रोका गया लेकिन उसका भी हल हम लोगों ने निकाल लिया और फिल्म वहां शूट कर ली। मोबाइल से शूटिंग के दौरान एक दिक्कत लाइट की थी। हम लोगों को सब कुछ नेचुरल लाइट में ही करना था तो रात में शूट करने का कोई सवाल ही नहीं था। दिन ही दिन में शूट निपटाना होता था। एक और दिक्कत ऑडियो की थी तो हम लोग आर्टिस्ट को ऐसी जगह प्लेस करते थे कि उनका ऑडियो फोन में रिकॉर्ड हो जाए, फिर बाद में उस हम लोग डबिंग कर सकें।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपने इस फिल्म में लीड रोल भी निभाया है। डायरेक्शन और एक्टिंग दोनों एक साथ मैनेज करना कैसा लगा, आसान या मुश्किल?

श्रेया रस्तोगी – डायरेक्शन और एक्टिंग दोनों एक साथ मैनेज करना काफी मुश्किल है। क्योंकि जब आप एक्टिंग कर रहे हो तो पता नहीं चलता कि स्क्रीन पर कैसा रिकॉर्ड हुआ है। हम लोगों का छोटा सा क्रू था। जब मैं एक्टिंग करती थी तो सतीश सर कैमरा देखते थे। खुद को शूट करने में काफी दिक्कत थी। कॉन्टीन्यूटी का भी ख्याल रखना था। कुल मिला कर काम काफी चैलेन्जिंग था लेकिन मजा आया। वैसे भी मुझे चैलेंजेस अच्छे लगते हैं।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपको डायरेक्शन और एक्टिंग में अच्छा क्या लगा।

श्रेया रस्तोगी – डायरेक्शन और एक्टिंग दोनों ही मजेदार है। एक्टिंग में खुद को कैरेक्टर के साथ ढालना होता है। जबकि आपको डायरेक्शन में सिर्फ रूल करना है। रही बात एक्टिंग की तो मैं लखनऊ में थियेटर करती थी। तो उसमें इंट्रेस्ट तो था ही। बस इतना कहना है कि एक्टिंग अगर मेरी हॉबी है तो डायरेक्शन मेरी हॉबी से बढ़ कर है।

मधुरेंद्र पाण्डे – अगर आपको किसी प्रोजेक्ट में एक्टिंग या फिर डायरेक्शन में से एक कोई चुनना हो तो क्या चुनेंगी।

श्रेया रस्तोगी – जाहिर है कि मैं पहले डायरेक्शन चुनूंगी। हां अगर किरदार ज़बरदस्त है तो एक्टिंग के बारे में सोचा जा सकता है।

मधुरेंद्र पाण्डे – सुंदरकांड फिल्म से आपको क्या उम्मीद है।

श्रेया रस्तोगी – सुंदरकांड जो है ये फीचर फिल्म का कॉन्सेप्ट था। मैंने कहा सतीश सर से क्यों ना मैं इस पर काम करूं। इसका लीड पहले मेल था जिसे मैंने फीमेल में बदला। कहानी दोबारा से लिखी। पहले सोचा था कि एक सीरीज़ के तौर पर बनाएंगे लेकिन बाद में हमने सोचा कि क्यों ना इसे ट्रैवलॉग के तौर पर बनाया जाए। सच कहूं तो इस फिल्म में मैंने दिल से काम किया है और मुझे अपनी फिल्म से काफी उम्मीद है। फिल्म लोंगों को ज़रूर पसंद आएगी।

मधुरेंद्र पाण्डे – श्रेया जी आपसे बात करके काफी अच्छा लगा। आपकी फिल्म ज़रूर सफल होगी।

श्रेया रस्तोगी – मुझे भी आपसे बात करके अच्छा लगा। धन्यवाद।

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