सतीश राममूर्ति | श्रीराम और जानकी के रोमांटिक ट्रैवलॉग के जनक

सुंदरकांड यादों के झरोंखों में झांकते इश्क की खूबसूरत दास्तान है। ये फिल्म दिल के उस पहलू को छूती है जो लोग अक्सर जान बूझ कर अनदेखा करने की कोशिश करते हैं। सच कहें तो इश्क के सातों रंग इस फिल्म में हैं। सुंदरकांड के प्रोड्यूसर सतीश राममूर्ति जी ने अपने कुछ अनुभव गॉसिपगंज के एडिटर मधुरेंद्र पाण्डे से साझा किए।

मधुरेंद्र पाण्डे – सतीश जी आपका स्वागत है। पहले तो सुंदरकांड के लिए ढ़ेरों बधाई। आपके ज़ेहन में इस फिल्म की कहानी आई कैसे?

सतीश राममूर्ति – मैं तो फोटोग्राफर था रमेश तलवार जी के साथ, वहीं पर उनके चीफ सुभाष फड़के जी से मुलाकात हुई थी और उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। मुझे भी लगा कि हां लिखा जा सकता है। उसके बाद फिर कृष्णा शाह जी ने मुझे स्क्रीन राइटिंग के गुर सिखाए। बस यूं कहें कि फोटोग्राफर से मेरे लेखक बनने में इन लोगों का बहुत बड़ा हाथ है। कृष्णा शाह जी तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन मेरी राइटिंग स्किल्स निखारने में उनका हाथ रहा है और बस इसी तरह सुंदरकांड की कहानी भी लिखी। इतना ही नहीं मुझे डायरेक्शन की ओर मोड़ने वाले भी सुभाष फड़के जी हैं।

मधुरेंद्र पाण्डे – जी तो ये कहानी आपने लिखी कब?

सतीश राममूर्ति – मैंने ये कहानी करीब 15 बरस पहले लिखी थी। ये कहानी मेरे दिल के काफी करीब थी औऱ मैं चाहता था कि इस पर एक फीचर फिल्म बने। लेकिन जब तक मौका आता माध्यम बदल चुका था और इसको हम लोगों ने वेब फिल्म बनाने के बारे में सोचा क्योंकि अब खास तौर से कोविड के दौर में वेब फिल्में ज्यादा सक्सेसफुल हैं।

मधुरेंद्र पाण्डे – इंडस्ट्री में आप काफी वक्त से हैं। कैसे इस इंडस्ट्री में आपकी शुरुआत हुई थी।

सतीश राममूर्ति – मैं रमेश तलवार जी का असिस्टेंट था। काफी पहले की बात है और फिर उसके बाद जो पहला ब्रेक था बतौर डायरेक्टर वो हेमा मालिनी जी ने दिया था एच एम प्रोडक्शन्स के बैनर तले और शो का नाम था संगम। खैर वो तो पुरानी बातें हैं। अब तो नए और किफायती तरीके आ गए हैं, फिल्में बनाना थोड़ा आसान हो गया है।

मधुरेंद्र पाण्डे – एक सवाल ये है कि आपने अपनी वेब फिल्म का नाम सुंदरकांड ही क्यों रखा?

सतीश राममूर्ति –  इसके पीछे भी खास वजह है। जैसे राम चरित मानस में हनुमान जी सीता जी खबर लाते हैं। वैसा ही इस फिल्म में भी है। बस किरदार का फर्क है। कहानी तो पूरी नहीं बता सकता लेकिन इतना है कि इस फिल्म में एक डायलॉग भी है ‘श्रीराम का सुंदरकांड हो गया’ जाहिर है कि फिल्म का काफी कनेक्शन राम चरित मानस के सुंदरकांड से है। इसीलिए इसका नाम सुंदरकांड रखा।

मधुरेंद्र पाण्डेश्रेया रस्तोगी इस फिल्म की डायरेक्टर हैं। उनके काम को आप कैसे देखते हैं।

सतीश राममूर्ति –  आपको नॉलेज किसी से भी मिल सकता है। सच कहूं तो सिनेमेटोग्राफर के तौर पर मैं श्रेया को क्रेडिट देता हूं। मैं फोटोग्राफर था, राइटर था लेकिन सिनेमेटोग्राफर नहीं था। वो मुझे श्रेया से पता चला। मैं खुश हूं कि मैं जो कहानी में चाहता था वैसा ही सब कुछ शूट हुआ।

मधुरेंद्र पाण्डे – सुंदरकांड की स्टोरी तो बड़े पर्दे पर भी आ सकती थी। आपने कोशिश क्यों नहीं की।

सतीश राममूर्ति –  देखिए कहानी जब मैंने लिखी थी तो बड़े पर्दे के लिए ही लिखी थी। दो बड़े एक्टर्स से बात भी हो गई थी। लेकिन फिर कुछ अड़चन आ गई। फिर हमने सोचा कि चलो खुद ही करते हैं। लेकिन कैसे करेंगे ये सोचने में 10 दिन निकल गए। कोविड का वक्त चल रहा है तो थोड़ी मुश्किलें तो थी हीं। फिर श्रेया ने कहा कि क्यों ना मोबाइल से फिल्म को शूट किया जाए।

मधुरेंद्र पाण्डे – मोबाइल से फिल्म शूट करने का अनुभव कैसा रहा?

सतीश राममूर्ति –   मोबाइल से फिल्म शूट करने का अनुभव अच्छा रहा। हमारे साथ हमारी यूनिट थी। डेढ़ घंटे की फिल्म शूट की थी जो एडिटिंग के बाद एक घंटे की बनी। मैंने रमेश तलवार जी को भी फिल्म दिखाई और उन्हें काफी पसंद आई। 

मधुरेंद्र पाण्डे – सुंदरकांड तो बन गई, इसके बाद और कौन-कौन से प्रोजेक्ट हैं जिन पर आप काम कर रहे हैं।

सतीश राममूर्ति –   एक कहानी तो कोविड पर ही है कि कोरोनावायरस ने कैसे लोगों के दरमियां बॉन्डिंग बढ़ाई है। ये एक ह्यूमन रिलेशन पर आधारित फिल्म है। इसमें कहानी और स्क्रीन प्ले मैंने लिखा है। इसके अलावा एक पैरानॉर्मल स्टोरी है वास्ता। इसको भी कर रहा हूं। मैं फिल्म मेकिंग में बहुत छोटी-छोटी चीज़ों पर ध्यान देता हूं। मैं मान कर चल रहा हूं कि मुझे एक महीने में तीन वेब फिल्में बनानी हैं। 6-7 स्टोरीज तैयार हैं।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपने अपने प्रोडक्शन हाउस रियर्स फिल्मस प्रोडक्शन्स की नींव कैसे रखी।

सतीश राममूर्ति –   रियर्स फिल्मस प्रोडक्शन्स 2014 में बनाया था और अब इसी पर काम कर रहा हूं। वेब फिल्मस में मेरा अधिक ज़ोर है क्योंकि ये फिल्म छोटे बजट में आसानी से बन जाती हैं।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपको सुंदरकांड के लिए एक बार फिर से शुभकामनाएं और बधाई। धन्यवाद गॉसिपगंज को वक्त देने के लिए।

सतीश राममूर्ति –   धन्यवाद।

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