संजय मिश्रा | करियर पर सैटर्न रिटर्न का प्रभाव

जिन्हें लगता है फिल्मों में बस एक ब्रेक मिलते ही वे दुनिया पर छा जाएंगे, उन्हें संजय मिश्रा की ज़िन्दगी में भी थोड़ा झांक लेना चाहिए। संजय मिश्रा के एक्टिंग करियर की गाड़ी इतने धीमे-धीमे चलती रही कि हो सकता है खुद शनि भी उस गति पर शर्मा जाएं।

एक्टिंग करियर की छुक-छुक गाड़ी से उतरकर बीच-बीच में संजय मिश्रा न जाने कहां-कहां टहल आए पर हर बार उन्हें अपनी गाड़ी उसी स्टेशन पर खड़ी मिली जहां वे उसे छोड़कर गए थे।

06 अक्टूबर 1963 को दरभंगा के पास नारायणपुर गांव में जन्में संजय मिश्रा ऐसे परिवार से आते हैं जहां पिछली तीन पीढ़ियां प्रशासनिक सेवाओं में रही हैं। घर का सबसे बड़ा बेटा होने के नाते उनपर कितना दबाव रहा होगा, यह आसानी से महसूस किया जा सकता है।

बहरहाल दूसरी बार में बड़ी मुश्किल से दसवीं पास होने वाले संजय मिश्रा किसी तरह ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी करके राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय(National School Of Drama) पहुंच गए।

पहला सैटर्न रिटर्न

जीवन के 27वें साल में यानी साल 1991 में उन्होंने मुंबई का रुख किया। करियर की शुरूआत में अमिताभ बच्चन के साथ मिरिंडा के विज्ञापन में नज़र आयी उनकी झलक इस बात का इशारा मानी जा सकती थी कि उन्हें जल्दी-जल्दी बड़ी कामयाबी मिल जाएगी, यह शायद खुद उन्हें भी लगा हो लेकिन वास्तविकता इस बात से कोसों दूर थी।

डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के प्रसिद्ध धारावाहिक चाणक्य(1992) में उनकी छोटी सी भूमिका ने यह बात और भी अच्छी तरह साबित कर दी क्योंकि सैट पर पहले ही दिन उन्हें अपने सीन के लिए 28 रिटेक देने पड़े। दरअसल माध्यम का बदलाव रंगमंच के मंजे हुए कलाकारों पर इसी तरह भारी पड़ता आया है।

रंगमंच करने वालों को अक्सर यह लगता है कि थिएटर कर लेने से उन्हें अभिनय में मदद मिलेगी पर होता इसका उल्टा है – दृष्य माध्यम होते हुए भी टीवी और फिल्मों की दुनिया कुछ ऐसी मांग करती है कि पहले का सीखा हुआ बिसारना पड़ता है, कुछ नया गढ़ना होता है। बाद में संजय मिश्रा ने वह बखूबी किया पर करियर की शुरूआत से लेकर आगे के 15 साल उनके लिए कठिन संघर्ष के रहे।

32वें साल तक आते आते फिल्म ‘Oh Darling! Ye hai India’(1995) से उन्हें बॉलीवुड में ब्रेक मिल चुका था। फिर भी वह सफलता अभी कोसों दूर थी जिसका उन्हें हकदार बनना था। अपने दावे के लिए तैयार होना था। इस यात्रा में Satya(1998) जैसी फिल्में भी आती गईं पर संजय मिश्रा का करियर ग्राफ अपनी मंथर गति से चल रहा था।

1999 के क्रिकेट विश्वकप के प्रसारण में उन्हें ‘एपल सिंह’ के रूप में दर्शकों का मनोरंजन करने का मौका भी मिला लेकिन ये तमाम मौके उन्हें फिल्मों में सफलता दिलाने में नाकाफी साबित हो रहे थे। मुंबई में गुजर-बसर आसान नहीं है यह बात कौन नहीं जानता। शायद संजय मिश्रा भी यह बखूबी जान गए थे इसलिए उन्होंने हो सकता है मन मार कर ही टीवी की ओर वापस रुख किया।

पंकज कपूर के साथ “ऑफ़िस-ऑफ़िस” में शुक्ला के किरदार के साथ वे अगले कुछ सालों तक लगातार नज़र आते रहे। इस बीच उनकी फिल्मों की यात्रा रुकी नहीं वह भी उसी मंथर गति से चल रही थी जो किसी को भी बेचैन करने के लिए काफी होती है।

और फिर वह दिन भी आ गया जब उन्होंने पूरी तरह हार मान ली। अपने पिता के देहांत पर वे जब वापस घर गए तो लौटकर मुंबई नहीं आए। बॉलीवुड से उनक मोहभंग पहले ही हो चुका था, पिता के निधन के बाद वे पूरी तरह विरक्त होकर मुंबई लौटने की बजाए हृषिकेश चले गए।

वहां कुछ वक्त तक उन्होंने एक ढाबे पर नौकरी की। पर मायानगरी की माया इतनी आसानी के कहां पीछा छोड़ती है। रोहित शेट्टी के बुलावे पर ‘गोलमाल’(2006) के साथ उनकी बॉलीवुड में शानदार वापसी हुई, हां यह और बात है कि गोलमाल के पहले ही यशराज फिल्म्स की ‘बंटी और बबली’(2005) से उन्हें ‘कुरैशी’ का यादगार किरदार मिल चुका था पर गोलमाल के बाद फिर उन्होंने मुड़कर नहीं देखा।

दूसरा सैटर्न रिटर्न

संजय मिश्रा ने अपने जीवन के 57 साल पूरे कर लिए हैं और साल 2018 से वे उनके जीवन के दूसरे सैटर्न रिटर्न से होकर गुज़र रहे हैं। इसबीच ‘आंखों देखी’ जैसी फिल्म से वे हीरो मटेरियल भी बन गए हैं। उनकी हालिया रिलीज़ ‘बहुत हुआ सम्मान’ उसी कड़ी में संजय मिश्रा का नया साकार है।

उम्मीद है साठ साल तक की उम्र तक पहुंचने की यात्रा में वे कुछ और बड़ी उपलब्धियां जरूर हासिल करेंगे। और रही बात करियर की शुरूआत में अमिताभ बच्च्न के साथ मिरिंडा के एड में काम करने की, तो कुदरत का वह इशारा अब जाकर असर दिखाने लगा है, बॉलीवुड में जो निर्माता निर्देशक अमिताभ बच्चन को साइन नहीं कर पाते, उनके पास संजय मिश्रा को साइन करने के अलावा फिलहाल कोई और विकल्प नहीं रह गया है।   

क्या है सैटर्न रिटर्न?

(सैटर्न रिटर्न दरअसल पाश्चात्य ज्योतिष का एक सिद्धांत है। सैटर्न रिटर्न की मान्यता के अनुसार किसी भी व्यक्ति के जीवन में 27वें से लेकर 32वें वर्ष के बीच बेहद महत्वपूर्ण घटनाएं होती हैं। जीवन में जटिलता ऐसे घुल जाती है जैसे पानी में नमक और चीनी। एक भयंकर छटपटाहट और बेचैनी पैदा होती है। इस परिस्थिति से पार पाने का एक ही तरीका है, उस X-Factor की खोज जो आपका होना तय करे… जो यह साहस जुटा लेते हैं वे पार लग जाते हैं बाकी एक किस्म के अफसोस की परछायी से जीवनभर बचने की कोशिश करते रहते हैं।)

Pankajj D Kaurab
Pankajj D Kaurab

Pankajj D Kaurab जी वरिष्ठ पत्रकार हैं और बॉलीवुड पर उनकी निगाह आम पत्रकारों से हट कर है। वो ज्योतिष और बॉलीवुड को जोड़ कर कर तथ्यात्मक लेख लिखते हैं। इनकी एक पुस्तक शनि प्यार पर टेढी नज़र भी बाज़ार में आ चुकी है और ये किताब अमेजन पर उपलब्ध है।

Pankajj D Kaurab जी की फेसबुक वॉल के साभार

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