बचपन से ही शुरु हो गया था ओम पुरी का संघर्ष

बचपन से ही शुरु हो गया था ओम पुरी का संघर्ष , अंबाला में पैदा होनेवाले ओम पुरी का बचपन बेहद गरीबी में गुजरा। जब ओमपुरी सात साल के थे तो उनके पिता जो रेलवे स्टोर में इंचार्ज थे , को चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया। जब उसके पिता जेल भजे गए तो रेलवे ने उनको दिया क्वार्टर भी परिवार से खाली करवा लिया। फटेहाली और तंगहाली में ओम के बड़े भाई वेद ने कुली का काम करना शुरू कर दिया और ओम पुरी को चाय की दुकान पर कप प्लेट साफ करने पड़े, लेकिन परिवार की मुश्किलें कम नहीं हो रही थी।

ओम पुरी की जिंदगी बड़ी ही संघर्षों में बीती, उनके घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वो कोयला बीनकर अपना पेट भरते थे। इतना ही नहीं परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने सात साल की उम्र में एक ढाबे पर भी काम किया। खाने के लाले पड़ रहे थे तो सात साल का बच्चा एक दिन एक पंडित जी के पास गया लेकिन बजाए मदद करने के पंडित ने सात साल के बच्चे का यौन शोषण कर डाला था।

ओम पुरी को बचपन से ही ट्रेन से बड़ा लगाव था। इसीलिए वो बड़े होकर ट्रेन ड्राइवर बनना चाहते थे। कुछ समय बाद ओम पुरी पंजाब के पटियाला में अपनी नानी के घर पर चले आए।  किसी तरह दोस्तों की मदद और अपने कठिन परिश्रम की वजह से ओमपुरी ने अपनी पढाई पूरी की। ओमपुरी जब 9वीं क्लास में थे तो उनके मन में ग्लैमर की दुनिया में जाने कई इच्छा होने लगी। अचानक एक दिन अखबार में उन्हें एक फिल्म के ऑडिशन का विज्ञापन दिखाई दिया और ओम ने उसके लिए अर्जी भेज दी।

कुछ दिनों के बाद एक रंगीन पोस्टकार्ड पर ऑडिशन में लखनऊ पहुंचने का बुलावा था। साथ ही एंट्री फीस के तौर पर पचास रुपए लेकर आने को कहा गया था। तंगहाली में दिन गुजार रहे ओमपुरी के पास न तो पचास रुपए थे और न ही लखनऊ आने जाने का किराया, सो फिल्मों में काम करने का यह सपना भी सपना ही रह गया। फिल्म थी जियो और जीने दो।

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