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रफ़ी साहब, जिनकी आवाज़ की गुलाम सदियां थीं और रहेंगी

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रफ़ी साहब, जिनकी आवाज़ की गुलाम सदियां थीं और रहेंगी , मोहम्मद रफ़ी की बहू और उनपर एक किताब लिखने वाली यास्मीन ख़ालिद रफ़ी कहती हैं कि रफ़ी की आदत थी कि जब वह विदेश के किसी शो में जाते थे तो वहां की भाषा में एक गीत ज़रूर सुनाते थे।उस दिन कोलंबो में भी उन्होंने सिंहला में एक गीत सुनाया। लेकिन जैसे ही उन्होंने हिंदी गाने सुनाने शुरू किए भीड़ बेकाबू हो गई और ऐसा तब हुआ जब भीड़ में शायद ही कोई हिंदी समझता था।रफ़ी को पहला ब्रेक दिया था श्याम सुंदर ने पंजाबी फ़िल्म ‘गुलबलोच’ में। मुंबई की उनकी पहली फ़िल्म थी ‘गांव की गोरी’।

चार फ़रवरी 1980 को श्रीलंका के स्वतंत्रता दिवस पर मोहम्मद रफ़ी को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में एक शो के लिए आमंत्रित किया गया था। उस दिन उनको सुनने के लिए 12 लाख कोलंबोवासी जमा हुए थे, जो उस समय का विश्व रिकॉर्ड था। श्रीलंका के राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने और प्रधानमंत्री प्रेमदासा उद्घाटन के तुरंत बाद किसी और कार्यक्रम में भाग लेने जाने वाले थे। लेकिन रफ़ी के ज़बर्दस्त गायन ने उन्हें रुकने पर मजबूर कर दिया और वह कार्यक्रम ख़त्म होने तक वहां से हिले नहीं।

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