बियॉन्ड द क्लाउड्स | फिल्म अच्छी है लेकिन सिर्फ एक क्लास के लिए

इस बार कुछ नया नहीं कर पाए माजिद मजीदी

बियॉन्ड द क्लाउड्स | फिल्म अच्छी है लेकिन सिर्फ एक क्लास के लिए, माजिद मजीदी एक ऐसा नाम है जो दुनिया भर के फ़िल्म लेजेंड्स में शुमार होते हैं। ‘चिल्ड्रेन ऑफ हेवेन’ और ‘द फादर’ जैसी फ़िल्मों से वर्ल्ड सिनेमा में पहचान रखने वाले माजिद की रिलीज़ हुई हिंदी फ़िल्म बियॉन्ड द क्लाउड्स मुंबई में ही शूट हुई है।

कहानी कहने का माजिद का बड़ा पोएटिक अंदाज़ है। वो दृश्यों के साथ खेलते हैं। वो बड़ी ही मंद गति से फ़िल्म को हौले-हौले आगे बढाते हैं।

‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ भाई-बहन की एक कहानी जो अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए ड्रग्स बेचते हैं और बहन धोबी घाट पे कुछ काम करती है। इनकी ज़िंदगी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। क्या-क्या उन्हें झेलना होता है, इसी धागे से बुनी है यह फ़िल्म ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’।

अभिनय की बात की जाये तो ईशान खट्टर ने साबित कर दिया है ,वो एक ज़बरदस्त अभिनेता हैं। मालविका मोहनन के रूप में बॉलीवुड को एक शानदार अभिनेत्री मिली है, जिनसे काफी उम्मीदें की जा सकती है। इसके अलावा सभी ने बेहतरीन अभिनय किया है।

कुल मिलाकर कहा जाए माजिद ने फ़िल्म तो अच्छी बनाई है लेकिन, यह कोई महान फ़िल्म नहीं है जैसी उम्मीदें हम लगाये बैठे थे। फ़िल्म का पहला भाग काफी स्लो है। कुछ दृश्य बेहतरीन बने हैं लेकिन, इस तरह के दृश्य हम ‘सलाम बॉम्बे’ या ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ में हम देख चुके हैं।

लोकेशन बहुत ज्यादा अचंभित नहीं करती। कहीं-कहीं यूं लगता है जैसे दृश्यों के संयोजन में माजिद मुंबई में भी ईरान तलाश रहे थे।

इंटरवल के बाद फ़िल्म की रफ़्तार पहले हाफ से बेहतर है। कई सारे दृश्यों को देखकर समझ आता है कि माजिद को मास्टर क्यों कहा जाता है? मगर पूरी फ़िल्म को देखते हुए कुछ बातें मुझे खटकती हैं जैसे किरदारों को स्थापित करने में बहुत ज्यादा समय लिया गया साथ ही रियलिस्टिक फ़िल्में बनाने वालों को अतार्किक होने की लिबर्टी नहीं मिलती!

जैसे फ़िल्म में ड्रग के मामले में पुलिस से भागा आमिर (ईशान खट्टर) जब पुलिस स्टेशन में अपनी बहन तारा (मालविका मोहनन) को बचाने जाता है और उसे कोई पुलिस वाला नहीं पहचानता?

फ़िल्म का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट जब झुम्पा (जीवी शारदा) अक्शी (गौतम घोष) के इकबालिया बयान बनवाती है, जिसका आगे कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ कि उस बयान का आखिर हुआ क्या? उस घटना को फ़िल्म में शामिल न किया गया होता तो अच्छा होता।

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