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भले ही ऊपर वाले ने वक्त कम दिया लेकिन खुद को साबित किया मीना कुमारी ने- भाग 2

भले ही ऊपर वाले ने वक्त कम दिया लेकिन खुद को साबित किया मीना कुमारी ने , 1 अगस्त 1932 को जन्म लेने के बाद ही मानो मीना कुमारी की ज़िंदगी में ग़म के अंधेरे अधिक थे और खुशियां किन्ही जुगनूं की मानिंद लेकिन वो अदाकारा ऐसी थीं जिनकी दुनिया कायल हो हई।  

‘बैजू बावरा’ के बाद मीना कुमारी ने साल 1953 तक तीन हिट फिल्में दी जिसमें दायरा, दो बीघा जमीन और परिणीता शामिल थी। परिणीता में मीना कुमारी के काम को काफी सराहा गया और उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खासा प्रभावित किया। माना जाता है कि इसी फिल्म के बाद उनकी छवि ‘ट्रैजिडी क्वीन’ की हो गई।

उनकी अदाकारी इस दर्जे की थी कि 1963 के दसवें फिल्‍मफेयर अवॉर्ड में बेस्‍ट एक्‍ट्रेस कैटेगरी में तीन फिल्‍में (मैं चुप रहूंगी, आरती और साहिब बीवी और गुलाम) नॉमिनट हुई थीं और तीनों में मीना कुमारी ही थीं। अवॉर्ड साहिब बीवी और गुलाम में ‘छोटी बहू’ के रोल के लिए मिला था। भले ही मीना कुमारी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही थीं लेकिन फिर भी उनके दिल में एक कसक हमेशा मौजूद रही।

मीना कुमारी ने कॅरिअर में जो बुलंदियां हासिल की, निजी जिंदगी में उतनी ही मुश्किलें झेलीं। जन्‍म से लेकर अंतिम घड़ी तक उन्‍होंने दुख ही दुख झेला। कामयाबी का जश्‍न मनाने का वक्‍त आता, तब भी कोई न कोई हादसा उनका पीछा करता ही रहता।

‘बैजू बावरा’ ने मीना कुमारी को बेस्‍ट एक्‍ट्रेस का फिल्‍म फेयर अवॉर्ड दिलवाया। वह यह अवॉर्ड पाने वाली पहली एक्‍ट्रेस थीं। इसके बाद भी उन्‍होंने एक से बढ़ कर एक फिल्में दीं। परिणीता, दिल अपना प्रीत पराई, श्रद्धा, आजाद, कोहिनूर…। 1960 के दशक में वह बहुत बड़ी स्‍टार बन गई थीं। यह स्‍टारडम उनकी निजी जिंदगी में कड़वाहट घोल रहा था। भले ही ज़िंदगी में दर्द थे लेकिन मीना कुमारी ने कभी हार नहीं मानी।

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