‘अनारकली ऑफ आरा’ से नहीं मिले तो समझिए कुछ नहीं देखा

‘अनारकली ऑफ आरा’ से नहीं मिले तो समझिए कुछ नहीं देखा , 21 वीं सदी में आज भी बहू, बेटियां और बहन घरेलू हिंसा, बलात संभोग व एसिड एटैक के घने काले साये में जीने को मजबूर हैं। घर की चारदीवारी हो या स्कूल-कॉलेज व दफ्तर चहुंओर ‘मर्दों’ की बेकाबू लिप्सा और मनमर्जी औरतों के जिस्म को नोच खाने को आतुर रहती है। ऐसी फितरत वाले बिहार के आरा से लेकर अमेरिका के एरिजोना तक पसरे हुए हैं। लेखक-निर्देशक अविनाश दास ने उन जैसों की सोच वालों पर ‘अनारकली ऑफ आरा’ के ज़रिए करारा प्रहार किया है।

समारोह में अनारकली की मां नाच-गा रही है। वह रायफल की दुनाली से पैसे निकाल रही होती है कि गलती से गोली चलती है और वह वहीं ढेर। पर हमारे कथित सभ्य समाज का उसूल देखिए उस गाने वाली की जान की कीमत कुछ नहीं। कोई आवाज नहीं उठाता। कहानी 12 साल आगे बढ़ती है। अनारकली इलाके की मशहूर गायिका है। उसके कार्यक्रम के आयोजन का ठेका रंगीला के पास है। एक वैसे ही कार्यक्रम में वाइस चांसलर धर्मेंद्र चौहान नशे में जबरन अनारकली से छेड़छाड़ करता है। अनारकली आजिज आ उसे थप्पड़ जड़ती है। बात आगे चलकर उसकी अस्मिता की सुरक्षा के आंदोलन में तब्दील हो जाती है।

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‘अनारकली ऑफ आरा’ में सभी किरदार रोचक हैं। उन्हें बड़ी खूबी से निभाया भी गया है। स्वरा भास्कर पूरी फिल्म में अनारकली के किरदार में डूबी नजर आती हैं। ‘अनारकली ऑफ आरा’ में उनके करियर का बेस्ट परफॉरमेंस है। साहस से भरा हुआ। क्लाइमेक्स में ‘नार देख के लार’ गाने पर उनका तांडव नृत्य प्रभावी फिल्म को अप्रतिम ऊंचाइयों पर ले जाता है। इस काम में उन्हें कलाकारों, गीतकारों, संगीतकारों व डीओपी का पूरा सहयोग मिला है। उनकी नज़र नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से फिल्म को लैस करती है। अविनाश दास ने अपने दिलचस्प किरदारों अनारकली, उसकी मां, रंगीला, हीरामन, धर्मेंद्र चौहान, बुलबुल पांडे व अनवर से कहानी में एजेंडापरक जहान गढा है। ‘अनारकली ऑफ आरा’ आपको मनोरंजन के साथ साथ बहुत कुछ देती है।

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