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बॉलीवुड में कला की जगह फूहड़ता और संवाद की जगह गालियों ने कैसे ले ली?

बॉलीवुड कितना बदल चुका है इसका अंदाजा आपको बंशी विचारक जी के इस लेख से हो जाएगा।बॉलीवुड में कला की जगह फूहड़ता और संवाद की जगह गालियों ने कैसे ले ली? वो लिखते हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में शादी के मौकों पर कुछ शगुन गाये जाते थे। विशेषतया वधूपक्ष के यहां महिला संगीत के समय गाये जाने वाले इन लोकगीतों में वरपक्ष के लोगों को जमकर गालियां दी जाती थी। मगर उस समय महिला संगीत में केवल महिलाएं ही जाया करती थी और पुरुषों को उससे दस गज दूर और बच्चों को सौ गज दूर रखा जाता था और महिलाएं उस संगीतमय माहौल में उन सभी गालियों की प्रैक्टिस कर लिया करती थी जो उन्होंने अपने जीवनकाल में अब तक सुनी थी।

और तो और लड़की की विदाई के समय लड़के के पिता और फूफा की पिटाई भी कुछेक रस्में निभाने के नाम पर कर ही दी जाती थी। ये पुरुषों और लौंडे लफाड़ों के साथ मिलकर महिला संगीत मनाने का चलन तो ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद आया। मगर इससे पहले ही मराठी सिनेमा के आकाश में उदय हो चुका था ‘कृष्णा कोंडके’ जी का जिनको कालांतर में ‘दादा कोंडके’ के नाम से जाना गया।

इन्होंने अपनी फिल्मों के नाम तो ‘द्विअर्थी’ रखे ही। साथ ही साथ नायक, नायिका और अन्य कलाकारों से द्विअर्थी संवाद भी बुलवाए। जनमानस को यह ‘फूहड़पन’ इतना पसंद आया कि इनकी नौ फिल्मों ने लगातार ‘सिल्वर जुबली’ मनाई और इनका नाम ‘गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में भी दर्ज़ हो गया।

वर्ष 1986 में ‘अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में’ से शुरू हुआ यह सफ़र वर्ष 2011 में ‘डेल्ही बैली’ तक आ पहुंचा जिसमें ‘डी के बॉस’ को भागने की सलाह दी गई। जिसके फलस्वरूप आज ड़ी के बॉस माल्या जी भागकर लंदन में बैठे हुए फुलछर्रे उड़ा रहे हैं।

इसके बाद पदार्पण हुआ ‘अनुराग कश्यप’ का जो शायद ‘यूनिवर्सिटी ऑफ गालिस्तान’ से गालियों का पूरा ‘क्रेश कोर्स’ करके आए थे। मई 2012 में उसने एक फ़िल्म बनाई ‘गैंग ऑफ वासेपुर’ और इस फ़िल्म में उसने ‘मनोज बाजपेई एंड कम्पनी’ से वो सभी गालियाँ दिलवा दी जो इस ब्रह्मांड में उस समय मौजूद थी।

इसके बाद भी जब उसका दिल नहीं भरा तो कुछ विशेष गालियों की रचना की गई और समस्त कायनात को उन ताज़ा तरीन गालियों से अवगत कराने के लिए इसी वर्ष अगस्त 2012 में इसी फिल्म का सीक्वल रिलीज किया गया ‘गैंग ऑफ वासेपुर पार्ट-2’ और इस फ़िल्म में उसने अपने मन की बची खुची भड़ास भी निकाल ली।

अश्लील इशारे और डांस तो उस भारतीय सिनेमा का हिस्सा अब हो ही गए थे जिस सिनेमा में कभी कली को कली से टकराते और उसके बाद फूल खिलता दिखाकर इशारों-इशारों में बहुत कुछ कह दिया जाता था। उस समय का नायक नायिका से बहुत ही अदब से पूछता था…. आँचल में क्या जी??? और नायिका लजराते हुए जबाब देती थी…. ‘अजब सी हलचल’।

अब यही प्रश्नोत्तरी ‘चोली के पीछे क्या है?’ तक आ पहुंची थी। इस चोली सॉन्ग और जिगर से बीड़ी जलाने वाले दुस्साहसिक कारनामों ने भारतीय युवा वर्ग को इतना दुस्साहसी बना दिया कि अब वह सरेराह चलते-चलते नैन मटक्का करते हैं।

एक छिछोरी लड़की ने अँखियाँ दबाकर एक अश्लील इशारा क्या किया कि 30 लाख भेड़ें उसकी दीवानी हो गई। वह दिन दूर नहीं जब चलती बसों में ‘कामसूत्र’ के पोज देती हुई युवा पीढ़ी धड़ल्ले से ‘वियाग्रा’ का विज्ञापन करती नजर आएगी।

यूं तो बंशी विचारक जी वैज्ञानिक हैं लेकिन देश के सम सामायिक विषयों पर अपनी गूढ़ राय रखते हैं। प्रस्तुत लेख बताता है कि समाज पर फिल्में कैसा प्रभाव छोड़ रही हैं। इससे आने वाले वक्त में क्या नुकसान होगा।