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रीमा दास | विलेज रॉकस्टार के लिए मिला नेशनल अवॉर्ड

अकेले दम पर बना डाली फिल्म, शूटिंग से लेकर एडिटिंग तक सब खुद किया

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रीमा दास | विलेज रॉकस्टार के लिए मिला नेशनल अवॉर्ड , सपने सभी देखते हैं पर सपनों को सच करने का जुनून उन्ही लोगों में होता है जिनको उनके सपने सोने नही देते! अर्थात वही लोग कामयाब होते है जो अपने सपनों को साकार करने के लिए दिन रात एक कर मेहनत करते हैं। कुछ इसी लाइन पर बनी है असम की महिला फ़िल्म निर्माता रीमा दास की ज़िंदगी। इस साल रीमा दास की असमिया फ़िल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ को राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में श्रेष्ठ फ़िल्म करार दिया गया है। स्वर्णकमल के साथ ही रीमा की फ़िल्म ने बेस्ट ऑडियोग्राफी, बेस्ट चाइल्ड एक्टर, बेस्ट एडिटिंग का भी नेशनल अवार्ड हासिल किया और ज्यूरी ने उनकी फ़िल्म की खासा प्रशंसा की। फ़िल्म निर्माता तथा नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स के ज्यूरी शेखर कपूर ने इस फ़िल्म को तहे दिल से सराहते हुए बॉलीवुड के फिल्मों के मुकाबले रीजनल फिल्मों की उभरती तस्वीर को आने वाला कल बताया है।

वैसे मुम्बई में कभी अभिनेत्री बनने का सपना लेकर गईं रीमा दास को सिल्वर स्क्रीन ने निराश किया। उच्च शिक्षित रीमा दास चाहती तो घर लौटकर आराम की कोई भी जॉब कर सकती थी, लेकिन रीमा का जैसे सिनेमा से रिश्ता बंध चुका था। 2009 में उन्होंने अपने पहली शार्ट फ़िल्म ‘प्रथा’ का निर्माण किया इसके बाद उन्होंने अपनी पहली फीचर फ़िल्म ‘अंतर्दृष्टि:Man with the binoculars’ का निर्माण भी किया। अब विलेज रॉकस्टार्स के बाद रीमा दास की आनेवाली फ़िल्म एक टीनएज लव स्टोरी पर आधारित है और इस बार वो फिल्म को ज्यादा बड़े पैमाने पर रिलीज़ करेंगी क्योंकि जिस पहचान के इंतज़ार में वो थीं, नेशनल अवॉर्ड ने उन्हें वो ‘रॉकस्टार’ पहचान दिला दी है।

‘विलेज रॉकस्टार्स’ कहानी है धुनु नाम के ऐसी एक छोटी बच्ची की जो आगे जाकर एक रॉकस्टार बनना चाहती है, पर उसकी विधवा मां के लिए उसे एक गिटार खरीद कर देना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। धुनु अपनी गरीबी के आगे झुकती नही है ओर एक नकली गिटार बना कर अपने साथियो के साथ एक बैंड बना लेती है। एक तरफ अपने सपनों की दुनिया में खोए बच्चों की ये रॉकबैंड और दूसरी तरफ बाढ़ जैसी कई मुश्किल हालातों से जूझता गांव वालों का जीवन, यही है विलेज रॉकस्टार्स की कहानी का फोकस। ‘वन वूमन आर्मी’ रीमा दास ने साढ़े तीन सालों में विलेज रॉकस्टार्स की पटकथा लिखी और सिर्फ एक कैनन 5 डी हैंड हेल्ड (हाथों से चालित) कैमरा से 150 दिनों तक फ़िल्म की शूटिंग की है और खुद ही फ़िल्म की एडिटिंग भी की।

गांव के जिन बच्चों ने और लोगों ने जीवन मे कभी कैमरा नही देखा उन लोगों से किसी पेशेवर आर्टिस्ट टीम की तरह ही एक्टिंग करवाने वाली रीमा दास ने एक निर्माता के तौर पर अपनी हुनर की नई पहचान बनाई है। फ़िल्म की मुख्य किरदार धुनु को निभाने वाली भनिता दास रीमा की कजिन है और इसी रोल के लिए उन्हें भी श्रेष्ठ बाल कलाकार का अवार्ड भी मिला है। फ़िल्म को श्रेष्ठ लोकेशन साउंड का अवार्ड भी मिला है जिसके लिए मल्लिका दास को सम्मानित किया गया। मल्लिका भी रिश्ते में रीमा की कज़िन हैं और यह कहना ग़लत नहीं होगा कि विलेज रॉकस्टार्स की तीन रॉकस्टार्स ये तीनों बहनें ही हैं। फ़िल्म की सह निर्माता रीमा दास की मां जया दास हैं और इस फ़िल्म को आप महिला सशक्तिकरण की एक जीवंत मिसाल भी मान सकते हैं।

बॉलीवुड की मेगा बजट फिल्मों और दूसरे प्रदेशों की अनगिनत फ़िल्मों से आगे निकलकर श्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करने के साथ ही इस फ़िल्म ने पिछले साल से अबतक दुनियाभर की एक से एक बेहतरीन फ़िल्म फेस्टिवल में कुल 21 अवार्ड बटोरे हैं। फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ को पिछले साल कान फिल्म समारोह के ‘हॉन्ग-कॉन्ग गोज टू कान’ कार्यक्रम में भी काफी सराहा गया। हर साल ‘हॉन्ग-कॉन्ग एशिया फिल्म फाइनेंस फोरम’ (एचएएफ) पूरे एशिया से कुल 4 फिल्मों का चयन करता है, जिनकी कहानी सबसे हटकर और सबसे खास होती है। ‘विलेज रॉकस्टार्स’ के अलावा पिछले साल इस्राइल की ‘इकोस’, जापान ताइवान की ‘ओमोतेनाशी’ और वियतनाम की ‘द थर्ड वाइफ’ को भी कान फेस्टिवल के लिए चुना गया था। ‘विलेज रॉकस्टार्स’ का इस फेस्टिवल के लिए चयन होना भारतीय फिल्मों के लिए गौरव की बात है। टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल से लेकर हॉन्ग कॉन्ग फ़िल्म फेस्टिवल तक प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ की जीत की यात्रा अभी भी जारी है।

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