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लिलिपुट | जिनकी ज़िंदगी एक सूफियाना कलाम की तरह है

ना किसी से गिला ना शिकवा, जो है उसको बेहतर करने की कोशिश

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लिलिपुट , उनके बारे में आप जितना जानेंगे उतनी ही तलाश बढ़ती जाएगी। अपने हुनर और अपनी कला सबका श्रेय वो ईश्वर को देते हैं। इतने सुलझे हुए व्यक्ति से मिलकर खुशी दो गुनी हो जाती है। लिलिपुट जी से गॉसिप गंज के एडिटर मधुरेंद्र पाण्डे ने खास बातचीत की और उनके उन पहलुओं को जानने की कोशिश की जो शायद आपको भी ना पता हों। एम एम फारुख़ी कैसे लिलिपुट बने और कैसे उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली। इन सारी चीज़ों पर चर्चा हुई।

मधुरेंद्र पाण्डे – आप साल 1975 में मुंबई आए। लेकिन जैसा कि होता है हर किसी के लिए मुंबई की डगर आसान नहीं होती। उस दौरान आपके दिल ओ दिमाग में क्या चलता था।

लिलिपुट – मैं ब्रेनलेस पैदा हुआ हूं (हंसते हुए), मुझे मेरे कर्म और भाग्य दोनों पर भरोसा है। मेरे हिसाब से कर्म और भाग्य पति-पत्नी हैं। कर्म के बिना भाग्य नहीं और भाग्य के बिना कर्म कुछ नहीं। हां मैं एक्टर बनने ही आया था मुंबई। उस ज़माने ऐसी कोई तकलीफ भी नही थी खास तौर से जिसे आप स्ट्रगल कहते हैं। मैं सड़कों पर सो जाता था। हर वो चीज़ होती थी जिसे आदमी स्ट्रगल कहता है। मुझे उसे लेकर कोई पछतावा या शर्मिंदगी नहीं है। अंधकार तो कभी महसूस हुआ ही नहीं। हां सफलता के बाद मुझे ये चीज़ें समझ में आईं कि जो सफलता मिली है उसे मेनटेन कैसे रखा जाए। मैं भगवान भरोसे रहता हूं। जो काम मिलता है उसे ईमानदारी से करता हूं। किसी ने ना तो अपना रिश्ता बढ़ाने की कोशिश की और ना ही किसी से अपना रिश्ता बिगाड़ने की कोशिश ही। बस यूं कहिए कि नॉर्मल ना दिखने वाला इंसान भले हूं लेकिन काफी नॉर्मल रहता हूं

साल 1975 में 31 दिसंबर की तारीख थी जब मैंने दादर स्टेशन पर कदम रखा था। सोचा था कि नए साल में नई ज़िंदगी की शुरुआत करनी है। मैं गया ज़िले में पला बढ़ा हूं। बहुत से बच्चे होते हैं बहुत अधिक पढने लिखने वाले, मै वैसा नहीं था। मुझे वर्तमान में रहना पसंद था उसे इन्ज्वॉय करना पसंद था। अच्छा उसका असर जो है मेरी पढ़ाई पर पड़ना तय था और वही हुआ हायर सेकेंडरी में मेरे मार्क्स इतने कम आए कि कहीं कोई कॉलेज एडमिशन देने को ही तैयार नहीं। लेकिन फिर उस मौके पर ईश्वर में मेरी मदद की। मगध यूनिवर्सिटी के संबद्ध एक नया कॉलेज खुला था मिर्जा गालिब के नाम से। चूंकि वो कॉलेज नया था लिहाज़ा मेरा एडमिशन हो गया और बस ग्रेजुएशन भी पूरा कर लिया। देखिए, एक चीज़ समझनी पड़ती है। सब कुछ ईश्वर की मर्जी से होता है। मैं भगवान पर भरोसा रखता हूं। मेरा मानना है कि जो करता है वो भगवान करता है। अब ना नया कॉलेज खुलता ना मेरा एडमिशन होता वो भी इतने कम पर्सेंटेज पर। दूसरे लहजे में आप समझना चाहें तो इस तरह समझ सकते हैं कि एक मां बाप की तीन संतानें हैं। मां बाप तो अपने तीनों बच्चों को एक जैसी सीख देते हैं लेकिन तीनों बच्चे अलग अलग तरह से आगे बढ़ते हैं या काम करते हैं। अब आप क्या कहेंगे है ना ईश्वर की मर्ज़ी।

मीर तकी मीर का एक शेर है ये मसला उससे भी समझा जा सकता है।

नाहक हम मजबूरों पर, यह तोहमत है मुख्तारी* की

चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस* बदनाम किया।

यहां मुख्तारी का मतलब आजादी से है और अबस का मतलब है फिजूल। तो आप खुद समझ सकते हैं कि हम क्या करते हैं और क्या ईश्वर करता है।

मधुरेंद्र पाण्डे – चालीस साल से ऊपर हो गए आपको इस इंडस्ट्री में। खुद को किस नज़र से देखते हैं।

लिलिपुट – मैं खुद को नॉर्मल कलाकार के तौर पर देखता हूं। अक्ल से सोचता हूं। अपने काम से संतुष्ट नहीं होता। भले ही लोग तारीफ करते हों लेकिन मेरी कोशिश रहती है कि इससे कुछ अच्छा हो या फिर जो हुआ है उससे भी अच्छा हो सकता था। अच्छा होना चाहिए। संतुष्टि मिलना संभव ही नहीं है अगर आदमी ईमानदार है तो। दरअसल किसी को अपने बारे में खुद से पता नहीं चलता है बल्कि सामने वाले के रिएक्शन से पता चलता है। कुछ आपको नकारात्मक नज़र से देखेंगे तो कुछ आपको सकारात्मक नज़र से। अब आपको तय करना है कि आप खुद क्या हैं। मेरा मानना है कि उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि अपने कर्म पर फोकस करना चाहिए।

मधुरेंद्र पाण्डे – कोई सपना जो आप पूरा करना चाहते हों। जिसकी कसक आपके दिल में है। एमएम फारुखी

लिलिपुट – मुझे लगता है कि कॉमेडियन्स अंदर से कितने भी सीरियस क्यों ना हों। लेकिन उन्हें कोई सीरियसली नहीं लेता। ये चीज़े दूसरे एक्टर्स के साथ भी होती हैं। लोग बड़े एक्टर्स को भी इंसान के तौर पर पसंद नहीं करते बल्कि उसके उन कैरेक्टर्स को पसंद करते हैं जो उसने निभाए होते हैं। उनका कोई फैन नहीं होता बल्कि उनके निभाए किरदारों के लोग फैन बनते हैं। काम करने की खुशी होती है लेकिन तकलीफ तब होती है जब कोई एवाइड करके निकल जाए। बस उस अंतर को पाटना है।

मधुरेंद्र पाण्डे – स्ट्रगल के दौरान कोई ऐसा वाकया जिसमें आपको दिल पर चोट पहुंचाई। और उसमें आपको आपकी मंज़िल के लिए और जुनूनी बना दिया हो।

लिलिपुट – ऐसा तो कुछ हुआ ही नहीं मेरे साथ क्योंकि मेरा साथ क्या कमाल हुआ कि, लोगों ने कभी इतने छोटे कद का एक्टर देखा ही नहीं था। ये मेरे लिए फायदे का सौदा था। मैं अगर 80 प्रतिशत भी करता था तो लोगों को 100 प्रतिशत समझ आता था। कुछ लोग होते हैं जो खुद से अलग मेरे जैसे लोगों को लेकर अलग सोच रखते हैं। लेकिन किसी ने कभी मुझे हर्ट नहीं किया। हां जिन्हें मैं अपना मानता हूं उनकी बातों पर दुख होता है। मैं गैरों से नहीं लड़ता, अपनों से लड़ता हूं। भावनात्मक रूप से जिससे जुड़ा हूं सिर्फ वही मुझे दुख पहुंचा सकता है।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपका एक सीरियल था देख भाई देख, लोगों ने खूब पसंद किया था। क्या कभी उसके सीक्वल के बारे में भी आपने सोचा?

लिलिपुट – देख भाई देख पार्ट 2 राइटिंग लेवल पर चल रहा है। उम्मीद है अगले साल आप उसे देख पाएंगे। सच कहूं तो देख भाई देख के ज़रिए ही मैं हिट हुआ। लेकिन जब लंदन गया तो जितना लोग शेखर सुमन, फरीदा , भावना , नवीन निश्चल के पीछे भागते थे मुझे उतना किसी ने पूछा भी नहीं। अब फैन्स ऐसे मिलते हैं, पूछते हैं कि आप काम क्यों नहीं करते हैं। लेकिन ये मैनें देखा कि जब वो पर्सनली मिलते हैं तो एवाइड करने की कोशिश करते हैं। मुझे ऐसा फील हुआ। लेकिन देख भाई देख पार्ट 2 की तैयारी है। उम्मीद है इसे भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिलेगा।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपने ‘बंटी बबली’ ‘शतरंज’ ‘सागर’ जैसी कई फिल्मों में काम किया है। आपको किस एक्टर के साथ काम करके सबसे अधिक आनंद आया।

लिलिपुट – देखिए सारे लोग मेरे साथ अच्छे रहे हैं। लोगों को सहानुभूति रहती है। वो हमेशा मेरे साथ अच्छे रहते हैं। लेकिन जो एक रिश्ता होता है, दोस्ती की जो चीज़ होती है वैसा नहीं हुआ।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपने 1998 में टीवी सीरीज ‘वो’ नॉन कॉमिक रोल भी किया है। आपको अपने बेहतर क्या लगता है कॉमिक रोल या फिर सीरियस किरदार?

लिलिपुट – मुझे हर किरदार करने में मज़ा आया। थियेटर में सारी खुजली मिटा ली है (हंसते हुए)। सीरियस निगेटिव, कॉमेडी सारे किरदार किए। हा एक चीज है नेगेटिव या सीरियस रोल में तालियां नहीं बजतीं। ये मिसिंग लगता था लेकिन रोल मुझे सारे पसंद हैं।

मधुरेंद्र पाण्डे – ज़िंदगी का कोई फलसफा आप अपने फैन्स को देना चाहते हैं जिससे वो सबक ले सकें।

लिलिपुट – देखिए सफल होने पर आदमी खुद को क्रेडिट देता है जबकि फेल होने पर भगवान को कोसता है। मैं ऐसा नहीं करता। हां मैं भगवान से शिकायत ज़रूर करता हूं।  दरअसल समाज में एक बड़ी दिक्कत है। लोग स्वार्थी हो गए हैं। अगर हम स्वार्थ को अपने ज़ेहन से निकाल दें तो शायद सबसे सुखी हो जाएं। लोग आपको योगा करने के फायदे ज़रूर बताएंगे लेकिन खुदगर्ज़ी छोड़ने के फायदे नहीं बताएंगे। अगर इस तरह का समाज बनेगा, हम इंसान कहलाने का हक नहीं रखेंगे। दूसरी चीज़ हम आधुनिकता के नाम पर दूसरे के कल्चर को अपनाते चले गए। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन दूसरे के कल्चर की भी सिर्फ अच्छी चीज़ें रखिए ना। जो हमारे समाज को सूट नहीं करता उसे अपना लो तो दिक्कत तो होगी ही।  मॉर्डन होने के नाम पर दूसरों की नकल करना ठीक नहीं है। आज लोग देश को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं। ईजाद कुछ किया नहीं लेकिन विश्व गुरू बनाएंगे। सिस्टम तक हम अपना डेवलप नहीं कर पाए तो क्या नकल करने में विश्व गुरू बनेंगे?

मधुरेंद्र पाण्डे – तो आपको क्या लगता है कि विश्व गुरु बनने का मामला सही नहीं है।

लिलिपुट – सही क्यों नहीं है हमें विश्व गुरु बनना चाहिए। लेकिन उस चीज़ में जिसमें हम वाकई विश्व गुरु हैं। इतने धर्मों को मानने वाले लोग, इतनी जातियां, इतनीभाषाएं हैं इस मुल्क में, फिर भी सब प्रेम से रहते हैं। प्रेम में विश्व गुरु बनिए, किसने रोका। बताइये दुनिया को कि हमारे देश में इतनी विभिन्नता है लेकिन फिर भी हम इतने प्रेम से कैसे रह लेते हैं। इस पर काम करें। दरअसल हम भारतीय भावुकता में बह जाते हैं और लोग बेहतर दिमाग वाले लोग हमारी उसी भावुकता से खेलते हैं। इसकी वजह स्वार्थ है। तो सबसे पहले स्वार्थ, खुदगर्जी जो भी कहें आप उसे छोड़िए। फिर देखिए देश कैसा चमकता है।

मधुरेंद्र पाण्डे – आपने ये बात बहुत सटीक कही है। ज़िंदगी के बारे में आपकी बेबाक राय जानकर अच्छा लगा। साथ आपसे बात करना खुद ज़िंदगी के दूसरे पहलू को जानने जैसा था।

लिलिपुट – मुझे भी अच्छा लगा।

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