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सूरमा | फिल्म अच्छी है लेकिन फिर दर्शक नहीं पहुंचे थियेटर तक

वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

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सूरमा | फिल्म अच्छी है लेकिन फिर दर्शक नहीं पहुंचे थियेटर तक, एक और बायोपिक ‘सूरमा’ इस शुक्रवार को रिलीज हुई है। ये बायोपिक हॉकी लेजेंड संदीप सिंह की कहानी कहती है। ये एक एवरेज स्पोर्ट्स बायोपिक है, लेकिन अच्छी फिल्म है। ‘सूरमा’ के कई दृश्य याद रह जाते हैं। मसलन संदीप के गोली लगने के बाद हॉस्पिटल से पहली दफा घर लौटने वाला सीन और मैदान में अपनी टीम के लिए गोल दागने वाले सीन। इनके बीच में जो है वह एक कहानी भर है। ‘सूरमा’ एक ऐसे खिलाड़ी की बायोपिक भी है, जिसकी कहानी प्रेरणा देने वाली है। हॉकी के मैदान में दुनिया के बेहतरीन ड्रैग फ्लिकर माने जाने वाले संदीप सिंह का किरदार फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने निभाया है। फिल्म के गाने भी लाजवाब हैं और जब भी आते हैं, इन्हें पब्लिक एन्जॉय करती है।

दिलजीत दोसांझ की फिल्में आपने पहले भी देखी होंगी। ‘उड़ता पंजाब’ से लेकर ‘सरदार जी’ तक, लेकिन ‘सूरमा’ में उन्होंने एक बड़ा किरदार अदा किया है। पूरी शिद्दत से उन्होंने अपने किरदार को निभाया है, लेकिन स्क्रिप्ट का तय दायरा मानो उनकी लय को तोड़ देता है। तापसी फिल्म में बतौर अभिनेत्री और हॉकी प्लेयर दोनों ही जगह फिट नजर आती हैं। अंबद बेदी, दानिश हुसैन, सतीश कौशिक, कुलभूषण खरबंदा और विजय राज अपने-अपने किरदार में छाप छोड़ जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि संदीप सिंह के भाई बिक्रमजीत सिंह भी फिल्म में एक महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आए हैं। बिक्रम ने फिल्म में पाकिस्तानी प्लेयर का किरदार अदा किया है।

‘किल दिल’ और ‘ओके जानू’ जैसी फ्लॉप फिल्मों का निर्देशन कर चुके शाद अली ने इस दफा अच्छी कहानी उठाई है, लेकिन दिक्कत यह है कि वह बॉलीवुड के तय खांचे को तोड़ने का जोखिम नहीं उठाते। वह गानों और इमोशन के बीच में एक प्लेयर के लेजेंड बनने की प्रक्रिया को उभारने से चूक जाते हैं। कुछ लूपहोल्स को छोड़ दें तो शाद अली का काम अच्छा है।

संदीप सिंह (दिलजीत दोसांझ) की हॉकी को लेकर कोई दीवानगी नहीं हैं, लिहाजा वह बचपन में ही हॉकी के मैदान को छोड़ देता है। वक्त गुजर चुका है, लेकिन संदीप की दीवानगी अभी भी हॉकी को लेकर नहीं, बल्कि उसकी दीवानगी हॉकी प्लेयर हरप्रीत (तापसी पन्नू) को लेकर है। संदीप अपनी इसी दीवानगी के चलते वापस हॉकी खेलने की इच्छा लिए मैदान पर लौटता है, लेकिन कोच सिवाय पनिशमेंट के संदीप को हॉकी के मैदान से दूर ही रखता है। संदीप हरप्रीत को पाना चाहता है और इधर शर्त यह है कि पहले उसके पास कोई नौकरी हो। अब हरप्रीत को पाने का रास्ता संदीप को हॉकी के सिवाय कहीं नजर नहीं आ रहा। मैदान पर वापसी आसान नहीं है, लेकिन इस काम में संदीप की मदद करता है, उसका ही बड़ा भाई बिक्रम सिंह (अंगद बेदी)। बिक्रम खुद हॉकी प्लेयर है, बेहतरीन खिलाड़ी होने के बावजूद वह नेशनल टीम में अपनी जगह नहीं बना सका। एक रोज बिक्रम खेत में संदीप को हॉकी स्टिक से चिड़िया भगाते हुए देखता है और गौर करता है कि संदीप के बॉल को ड्रैग करने का तरीका खास है। बिक्रम को ये तो समझ आ गया कि संदीप अच्छा ड्रैग फ्लिक कर लेता है, लेकिन अभी भी टीम में संदीप की एंट्री मुश्किल है।

बिक्रम, संदीप को लेकर पटियाला में हॉकी कोच हैरी (विजय राज) के पास पहुंचता है और यहीं से एक एमेच्योर ड्रैग फ्लिकर के प्रोफेशनल प्लेयर बनने की कहानी शुरू होती है। संदीप, हरप्रीत के लिए हॉकी खेलना चाहता है, जिसके साथ-साथ उसके पिता और भाई का सपना भी समानांतर चल रहा है। इधर बिक्रम अपने अधूरे सपने को संदीप के रूप में पूरा होते हुए देख रहा है। संदीप इंडियन टीम की ओर से खेलते हुए 2006 में अपने पहले ही इंटरनेशनल डेब्यू मैच में तहलका मचा देता है। जिंदगी जिस वक्त पटरी पर लौटती हुई लग रही होती है, ठीक उसी दौरान वर्ल्ड कप खेलने के लिए जाते हुए ट्रेन में संदीप सिंह को एक सुरक्षाकर्मी के हाथों गोली लग जाती है। संदीप पैरालाइज हो जाता है। संदीप अभी भी यह सोचकर संतुष्ट है कि आखिरकार हरप्रीत तो उसके पास है ही और उसने तो हॉकी थामी ही हरप्रीत के लिए थी…लेकिन कहानी यहीं से बदलती है और एक हॉकी प्लेयर के लेजेंड बनने का सफर शुरू होता है। एक ऐसा लेजेंड जो ठीक होता है और अपने पैरों पर खड़ा होकर दुनिया का सबसे खतरनाक ड्रैग फ्लिकर बन जाता है। भावनाओं, संवेदनाओं, इच्छाओं और जज्बे के बीच एक प्लेयर की जिंदगी का खाका बुनती हुई ‘सूरमा’ खत्म हो जाती है, लेकिन इसके बीच ऐसा बहुत कुछ है जो घट चुका है।

 

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