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अक्टूबर | मूवी रिव्यू | ठहरी हुई लेकिन बेहतरीन फिल्म

अनकहे इश्क का दास्ता कहती है फिल्म

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अक्टूबर | मूवी रिव्यू | ठहरी हुई लेकिन बेहतरीन फिल्म, शुजीत सरकार ने बीते कुछ सालों में कई बेहतरीन फिल्में दर्शकों को दी हैं। जिस कारण उनकी अक्टूबर से काफी सारी उम्मीदें की जा रही हैं।शुजीत सरकार द्वारा निर्देशित और जूही चतुर्वेदी द्वारा लिखित फिल्म अक्टूबर की कहानी डेन (वरुण धवन) और शिउली (बनीता संधू) के आसपास घूमती नजर आती है। यह दोनों एक पांच सितारा होटल में ट्रेनी हैं और वहां गेस्ट के लिए खाना बनाने से लेकर, फ्लोर साफ करने तक; हर एक काम करते हैं। जहां डेन अपनी जिंदगी में हर वक्त चिढ़ा-चिढ़ा सा रहता है, वहीं शिउली अपनी जिंदगी को बहुत ही संतुलित तरीके से जीती है।

सब कुछ ठीक ही चल रहा होता है कि न्यू ईयर ईव पर शिउली एक हादसे का शिकार हो जाती है और कोमा में पहुंच जाती है। कोमा में जाने से पहले उसने डेन के बारे में पूछा था। जब यह बात डेन को पता चलती है तो उसके मन में उम्मीद की एक किरण जाग उठती है। उम्मीद की यह किरण कब सच्चे इश्क का रूप ले लेती है, डेन को भी पता नहीं चलता है। अब डेन की जिंदगी का एक ही मकसद है; शिउली से यह पूछना की आखिरकार उसने सबसे उसके बारे में क्यों पूछा था ?

फिल्म अक्टूबर की सबसे खास बात इसका लेखन है। जूही चतुर्वेदी ने डेन और शिउली की जिंदगी में होने वाली चीजों को इतनी सरलता से पर्दे पर पेश किया है कि आप उनके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। आपको अगर डेन के चिढ़-चिढ़ेपन पर हंसी आती है तो उसकी बेवकूफियां आपके दिल के तारों को भी छेड़ती हैं। वरुण धवन अक्टूबर में एक 21 साल के लड़के के रूप में दिखाई दिए हैं। उन्हें पर्दे पर देखते हुए एक बार भी ऐसा नहीं लगता है कि वो अपने किरदार के साथ बेईमान हैं। फिल्म ‘अक्टूबर’ के म्यूजिक और कैमरा वर्क की भी तारीफ करनी होगी। अक्टूबर को देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि शांतनु मोइत्रा (म्यूजिक कम्पोजर) और अविक मुखोपाध्याय (सिनेमेटोग्राफर) ने खूबसूरत काम किया है।

शुजीत सरकार ने फिल्म ‘अक्टूबर’ का ज्यादातर हिस्सा अस्पताल और होटल के आसपास ही फिल्माया है, जिसमें 3 से 4 किरदार लौट-लौट कर दर्शकों के सामने आते रहते हैं। इसकी वजह से एक समय के बाद यह फिल्म दर्शकों के सामने कुछ नया पेश नहीं कर पाती है। क्योंकि फिल्म की लोकेशन्स और किरदार सीमित हैं, इसकी वजह से ‘अक्टूबर’ की कहानी आगे बढ़ने के बावजूद भी ठहरी हुई नजर आती है।

अगर चर्चा बनीता संधू की करें तो उनके पास ‘अक्टूबर’ में करने के लिए कुछ खास नहीं है, जो कि निराशा की बात है। वो फिल्म की शुरूआत में कुछ डायलॉग बोलती हुई जरूर दिखती हैं लेकिन उसके अलावा वो ज्यादातर वक्त बेड पर ही रहती हैं लेकिन बनीता को जो जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने उसे बखूबी निभाया है। इसके साथ-साथ डेन शुरूआत में हमेशा इतना चिढ़-चिढ़ा क्यों रहता था, यह सवाल भी ‘अक्टूबर’ के अंत में अनुत्तरित रह जाता है।

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