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नानू की जानू | मनोरंजन से भटकी हुई फिल्म जो परेशान कर देती है

फिल्म रिव्यू

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नानू की जानू | मनोरंजन से भटकी हुई फिल्म जो परेशान कर देती है, भूतनी के इंसान के प्यार की कहानी तमिल की सफल फिल्म पिसासु से प्रभावित है। तमिल फिल्म एक ड्रामा फ़िल्म थी जबकि ये एक हॉरर कॉमेडी फिल्म है। अभिनय देखा जाए तो अभय देओल एक मंझे हुए अभिनेता हैं। हमेशा ही वह परदे पर अपने किरदार में रच बस जाते हैं। पत्रलेखा को फ़िल्म में करने को कुछ खास नहीं था। वह 15 से 20 मिनट ही कुलमिलाकर नज़र आयी हैं। बृजेन्द्र कालरा और राजेश शर्मा सहित दूसरे कलाकारों का काम ठीक ठाक था। मनु ऋषि की तारीफ करनी होगी। उनका अभिनय इस फ़िल्म की एकमात्र यूएसपी कहा है। तू जानता है मैं कौन हूं वाला इंसान उन्हें दिखाया गया। फ़िल्म के दो तीन दृश्यों में वह लाजवाब रहे हैं।

नानू (अभय देओल) की कहानी है। जो दिल्ली का एक गुंडा है। अपने दोस्तों के साथ मिलकर वह दूसरे के घरों पर कब्ज़ा करता है। इसी बीच नानू सड़क हादसे में चोटिल लड़की सृष्टि (पत्रलेखा) को अस्पताल ले जाता है। उसे बचाने की कोशिश करता है । लड़की की डेथ होते ही यही मरी हुई लड़की भूतनी बनकर नानू के पीछे पड़ जाती है। वह नानू को बहुत चाहती है पर नानू उससे बहुत डरता है। फिर शुरू होती है कॉमेडी। एक सस्पेंस भी है कि सृष्टि की मौत से जुड़ा। इन सब सवालों के जवाब के लिए आपको नानू की जानू देखनी पड़ेगी।

स्क्रिप्ट देखी जाए नानू की जानू शुरुआत में ज़रूर कुछ कुछ दृश्यों के ज़रिए ही सही लेकिन एंटरटेन करती है लेकिन इंटरवल के बाद फ़िल्म बोझिल है। खासकर आखिरी एक घंटे में इमोशन, हॉरर के साथ-साथ संदेश जोड़ने के चक्कर में मनोरंजन से भटक गई है। रोड़ सेफ्टी से लेकर मोबाइल तक सब पर भाषण शुरू हो जाता है।जिससे यह हल्की-फुल्की कॉमेडी वाली फ़िल्म बचकानी सी लगने लगती है। फिल्म का गीत संगीत औसत है। सपना चौधरी की मौजूदगी वाला गीत भी बेअसर सा है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी और संवाद अच्छे हैं। कुलमिलाकर हॉरर कॉमेडी वाली यह फ़िल्म मनोरंजक करने से चूकती है।

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