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मनमर्जियां फिल्म रिव्यू | परिवार के साथ फिल्म देखने की भूल ना करें

मनमर्जियां अनुराग कश्यप की ये फिल्म उन रिश्तों की कहानी बयां करती है जैसी सामाजिक रिश्तों के साथ नैतिक मूल्यों की कहानी कहती बी आर चोपड़ा की फिल्में कह चुकी हैं। चाहे गुमराह हो आ फिर सिलसिला। वैसे भी प्रेम और रिश्तों की असमंजस फिल्मकारों का पसंदीदा विषय है। दो लोगों का प्रेम होना उनका बिछड़ना ,किसी एक की शादी, प्रेम का अधूरा रह जाना, फिर कहीं ना कहीं आकर्षण होना, यह मानवीय संवेदना है। मनमर्जियां में सामाजिक मूल्यों के साथ-साथ नैतिक मूल्य भी जोड़ने की कोशिश की गई है।

कुल मिलाकर फिल्म पारिवारिक नहीं है। आप अपने बच्चों को या अपने माता-पिता के साथ इस फिल्म को देखने में संकोच कर जाएंगे। फिल्म में पंजाबी परिवार का चित्रण ऐसा किया है मानो कहानी गुजरात में कहीं जा रही हो। और पूरे परिवार का मकसद सिर्फ अहिंसा परमो धर्म हो। पारिवारिक मूल्य, सामाजिक मूल्य और नैतिक मूल्यों का कोई अर्थ इस फिल्म में नजर नहीं आता।

फिल्म की कहानी में कोई नयापन भले ना हो लेकिन उसके ट्रीटमेंट में जरूर नयापन है और सबसे बड़ी बात कश्यप अपने कंफर्ट जोन से बाहर आकर शुद्ध प्रेम कहानी पहली बार कह रहे हैं। ‘मनमर्जियां’ में सारे मसाले डाले गए हैं। खूबसूरत से प्रेमी प्रेमिका है, समझदार और हैंडसम सा पति है ,संगीत है। जुड़वा बहनों का डांस है और भरपूर हॉट सींस भी हैं।

अभिनय की बात करें तो तापसी पन्नू का किरदार रूमी वैसे ही जबरदस्त लिखा गया है। उसको तापसी ने तूफानी बना डाला। जिस आत्मविश्वास और क्राफ्ट के सहारे वो पूरी फिल्म में चली है वैसे कम ही एक्टर्स कर पाते हैं। विकी कौशल स्क्रीन को चकाचौंध से भर देते हैं। अभी तक जितने भी उन्होंने किरदार किए हैं से बिल्कुल अलहदा इस किरदार में विकी ने जान फूंक दी। अभिषेक बच्चन इन दो तूफानों को ना सिर्फ समेटने का काम करते हैं बल्कि पूरी फिल्म को एक ठहराव देते हैं।

बाजार के समीकरण कहें या निर्देशकीय समाज, फिल्म में प्रेम से ज्यादा वासना नजर आती है। इसलिए किसी किरदार से आपकी नजदीकी नहीं बनती। कुल मिलाकर ‘मनमर्जियां’ अनुराग कश्यप जैसे दिग्गज निर्देशक की होने के बावजूद बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती।