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लैला मजनू फिल्म रिव्यू | सच्चे इश्क की बेहतरीन अदाकारी

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लैला मजनू के किस्से सबको पता है। वैसे भी भारतीय सिनेमा में दुखद प्रेम कहानियों का अपना एक स्थान रहा है। शुरूआत में हीरो-हीरोइन के बीच होने वाली प्यारी नोंक-झोंक दर्शकों के चेहरों पर मुस्कुराहट बिखेरती और अंत में जब दोनों बिना मिले ही दुनिया से चले जाते हैं तो दर्शकों की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई डायरेक्टर साजिल अली की फिल्म ‘लैला मजनू’ भी ऐसी ही दुखद प्रेम कहानी हमारे सामने पेश करती है।

साजिद अली ने फिल्म की कहानी को कश्मीर में सेट किया है और पहले ही फ्रेम से आपको इसका अहसास होने लगता है। उन्होंने फिल्म में कश्मीर की खूबसूरती को बखूबी दिखाया है। फिल्म में अविनाश तिवारी ने जबरदस्त अदाकारी की है। उनका किरदार काफी कॉम्प्लेक्स है, जिसको उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से निभाया है। फिल्म ‘लैला मजनू’ में अविनाश तिवारी की परफॉर्मेंस, इस साल की टॉप 5 परफॉर्मेंसेज में से रहेगी।

तृप्ति डिमरी ने भी फिल्म में अच्छा अभिनय किया है लेकिन फिल्म की कहानी काफी हद कर अविनाश के आसपास ही घूम रही थी, जिस कारण उनके पास बहुत ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं था। साजिद अली ने फिल्म का डायरेक्शन कमाल का किया है। आप हर एक इमोशन को फील कर पाते हैं और फिल्म की शुरूआत से ही आप कैस-लैला के साथ जुड़ जाते हैं। ‘लैला मजनू’ की कहानी को साजिद ने अपने अंदाज में कहा है जिसकी जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है।

फिल्म की शुरूआत दो ऐसे परिवारों से होती है, जिनकी दुश्मनी सालों से चली आ रही है। ये परिवार एक-दूसरे से नजरें तक मिलाना पसंद नहीं करते हैं। इसके बाद हमारे सामने आते हैं हमारे हीरो-हीरोइन लैला (तृप्ति डिमरी) और कैस (अविनाश तिवारी), ये दोनों इन्हीं परिवारों की नई पीढ़ी से रिश्ता रखते हैं। कैस की बात करें तो वो फिल्म में अमीर बाप की बिगड़ैल औलाद है।

वो एक समय में कई लड़कियों के साथ रिश्ता रखता है लेकिन जैसे ही वो लैला को देखता है उसे पहली नजर में पसंद करने लगता है। जैसे ही इनके प्यार की खबर गांववालों को लगती है, वैसे ही वो लैला के घरवालों को इसकी जानकारी दे देते हैं। लैला के घरवाले उसकी शादी इब्बान (सुमित कौल) के साथ करा देते हैं, जो कि एक पॉलीटीशियन है। लैला की शादी के बाद कैस विदेश चला जाता है। उसे लगता है कि विदेश जाने के बाद वो लैला को भूल जाएगा।

फिल्म के गाने कमाल के हैं। ये ‘लैला मजनू’ की कहानी को सपोर्ट करते हैं। ‘हाफिज-हाफिज’ गाना तो दर्शकों की जुबान पर चढ़ ही जाता है। लेकिन लैला के किरदार पर थोड़ा सा और ध्यान दिया गया होता तो दर्शकों फिल्म कुछ और बेहतर हो सकती थी। 4 साल के बाद कैस को दोबारा भारत आना पड़ता है क्योंकि उसके पिता की मौत हो जाती है। दोनों के सच्चे इश्क का भविष्य क्या होगा यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

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