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हेलीकॉप्टर ईला मूवी रिव्यू | काजोल को देखना हो तभी फिल्म देखने की हिम्मत कीजिए

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हेलीकॉप्टर ईला अपने मुद्दे से भटकी हुई फिल्म है। फिल्म का मुद्दा है कि काजोल के भीतर एक गायिका बनने की दबी ख्वाहिश जो बच्चे की पैदाइश के बाद वो सपना अधूरा रह जाता है। ‘हेलीकॉप्टर ईला’ को देखने में आपको बोरियत महसूस नहीं होगी लेकिन फिल्म की लिखावट में कुछ चीजें है जो आपका मजा किरकिरा कर सकती हैं।

फिल्म का क्लाइमेक्स यही है कि वो अपने सपने को स्टेज पर गाकर पूरा करती है लेकिन परेशानी इस बात की है कि काजोल की इस दबी हुई मंशा को फिल्म में महज शुरू और आखिर में दिखाया गया है। बाकी फिल्म के दौरान आपको ऐसा कोई सीन देखने को नहीं मिलेगा जब काजोल अपनी इच्छा किसी के सामने जाहिर करती है।

हेलीकाप्टर ईला  पूरी तरह से काजोल के कंधे पर टिकी हुई है। फिल्म के पहले फ्रेम से लेकर आखिर फ्रेम तक काजोल नजर आती है। उनकी शानदार भूमिका की वजह से फिल्म में रूचि बनी रहती है। रिद्धि सेन फिल्म में विवान के रूप में नजर आएंगे और उनको देखकर यही लगता है कि कम उम्र के होने के बावजूद उनके काम में किसी तरह की कमी नहीं है। उनका काम भी बेहद सधा हुआ है और अपने हर सीन में उन्होंने अपने अभिनय हुनर का परिचय दिया है। बंगाली फिल्मों के जाने-माने कलाकार तोता रॉय चौधरी इस फिल्म में काजोल के पति की भूमिका में दिखाई देंगे और अपने छोटे रोल में भी उनका काम सहज और जोरदार है। नेहा धूपिया भी कालेज की ड्रामेटिक्स की प्रोफेसर की भूमिका से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने में कामयाब रही हैं।

फिल्म के निर्देशक प्रदीप सरकार ने निराश किया है । अगर उनकी पिछली फिल्म ‘मर्दानी’ एक कसी हुई स्क्रिप्ट का शानदार नमूना था तो वहीं दूसरी तरफ ‘हेलीकॉप्टर ईला’ में उनकी पकड़ काफी ढीली दिखाई देती है। कई चीजों को फिल्म में काफी सतही स्तर पर दिखाया गया है। इंटरवल तक इस फिल्म को देखने में मजा आता है। प्रदीप सरकार ने मां और बेटे के बीच के रिश्ते को बड़े ही आधुनिक तरीके से दिखाया है जो अच्छा लगता है। नब्बे के दशक के इंडी म्यूजिक सीन को जिस तरह से फिल्म में दिखाया गया वो काफी मजेदार है।

अमित त्रिवेदी के गाने फिल्म में आते हैं और चले जाते हैं लेकिन दिमाग में घर नहीं कर पाते हैं। ये फिल्म आनंद गांधी के गुजराती प्ले पर आधारित है जिसका स्क्रीनप्ले मितेश शाह और आनंद गांधी ने साझे तौर पर लिखा है। स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी खामी यही है कि फिल्म एक ही ढर्रे पर चलती है यानि मोमेंट्स ही हैं जो फिल्म को आगे बढ़ाते हैं न कि इसकी कहानी। फिल्म के अंत में आप खुद से यही कहेंगे कि मस्ती में कहीं कमी रह गई थी। आप इस फिल्म को आजमा सकते हैं लेकिन चेतावनी यही होगी कि सितारों के अभिनय को छोड़कर आप फिल्म से ज्यादा उम्मीद मत बांधिएगा।

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