युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी दमदार फिल्म है रंगून , युद्ध और प्रेम में सब जायज है। युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी प्रेम कहानी में भी सब जायज हो जाना चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध के बैकड्रॉप में बनी विशाल भारद्वाज की रंगीन फिल्म ‘रंगून’ में यदि दर्शक छोटी-छोटी चूकों को नजरअंदाज करें तो यह एक खूबसूरत फिल्म है। इस प्रेम कहानी में राष्ट्रीय भावना और देश प्रेम की गुप्त धार है, जो फिल्म के आखिरी दृश्यों में पूरे वेग से उभरती है। विशाल भारद्वाज ने राष्ट्रम गान ‘जन गण मन’ के अनसुने अंशों से इसे पिरोया है। किसी भी फिल्म में राष्ट्रीय भावना के प्रसंगों में राष्ट्रगान की धुन बजती है तो यों भी दर्शकों का रक्तसंचार तेज हो जाता है।

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रंगून’ में विशाल और गुलजार की पूरक प्रतिभाएं मूल कहानी का वेग बनाए रखती हैं। हुनरमंद विशाल भारद्वाज गंभीर प्रसंगों में भी जबरदस्त ह्यूमर पैदा करते हैं। कभी वह संवादों में सुनाई पड़ता है तो कभी कलाकारों के स्वभावों में दिखता है। ‘रंगून’ में भी पिछली फिल्मों की तरह विशाल भारद्वाज ने सभी किरदारों को तराश कर पेश किया है। हमें सारे किरदार अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ याद रहते हैं। यही काबिल निर्देशक की खूबी होती है कि पर्दे पर कुछ भी बेजा और फिजूल नहीं होता। मुंबई से तब के बर्मा के बॉर्डर तक पहुंची इस फिल्म के सफर में अधिक झटके नहीं लगते। विशाल भारद्वाज और उनकी तकनीकी टीम सभी मोड़ों पर सावधान रही है। विशाल भारद्वाज ने सैफ अली खान को ‘ओमकारा’ और शाहिद कपूर को ‘कमीने’ व ‘हैदर’ में निखरने का मौका दिया था।

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एक्शन और डांस करते समय वह पिछली फिल्मों से अधिक आश्वास्त नजर आती हैं। बतौर अदाकारा उनमें आए निखार से ‘रंगून’ को फायदा हुआ है। मिस जूलिया के सहायक किरदार जुल्फी की भूमिका निभा रहे कलाकार ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अन्य सहयोगी कलाकार भी दृश्यों के मुताबिक खरे उतरे हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म की कहानी का अविभाज्य हिस्सा होता है। गुलजार उनकी फिल्मों में भरपूर योगदान करते हैं। दोनों की आपसी समझ और परस्पर सम्मान से फिल्मों का म्यूजिकल असर बढ़ जाता है। इस फिल्म के गानों के फिल्मांकन में विशाल भारद्वाज ने भव्यता बरती है। महंगे सेट पर फिल्मांकित गीत और नृत्य तनाव कम करने के साथ कहानी आगे बढ़ाते हैं।

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