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भगवान दादा | जिनके एक थप्पड़ ने ललिता पवार के करियर को पंख लगा दिए

जन्मदिन विशेष

भगवान दादा | जिनके एक थप्पड़ ने ललिता पवार के करियर को पंख लगा दिए, हिंदी सिनेमा के महान अभिनेता-निर्देशक भगवान दादा को दुनिया से अलविदा कहे 16 साल बीत चुके हैं। भगवान दादा का जन्म 1 अगस्त 1913 को महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग में हुआ। उनके पिता कपड़ा मिल में काम करते थे।  उनका असली नाम भगवान अबाजी पांडव था।

खुद भगवान दादा ने भी फिल्मों में आने से पहले मजदूरी तक की थी। वे भी श्रमिक के तौर पर काम करने लगे लेकिन फिल्म का ख्वाब वे अपनी आंखों में संजोए हुए थे। लेकिन उन्हें कुश्ती का बहुत शौक था जिस वजह से उनके नाम के साथ दादा जुड़ गया और वे भगवान दादा हो गए।

उन्होंने सायलेंट एरा में फिल्मों में कदम रखा और ‘क्रिमिनल’ उनकी पहली फिल्म थी। । अभिनय के बाद उन्होंने फिल्म निर्देशन में भी आजमाया। अलबेला (1951) और उसके गीत “शोला जो भड़के” और  “भोली सूरत दिल के खोटे”आज भी याद किये जाते हैं। भगवान दादा की पहली बोलती फिल्म “हिम्मत-ए-मर्दा” (1934) थी। इस फिल्म से एक दुखद किस्सा जुड़ा हुआ है।

फिल्म में मुख्य भूमिका में ललिता पवार थीं। फिल्म की शूटिंग के दौरान भगवान दादा को ललिता पवार को थप्पड़ मारना था। सीन में असलियत का अहसास लाने के लिए भगवान दादा ने थोड़ा ज्यादा ही कस कर थप्पड़ मार दिया जिससे ललिता पवार के आँख के करीब की एक नस फट गई।

ललिता पवार फेशियल पैरालिसिस का शिकार हो गईं और उलटे हाथ की नस भी फट गई। तीन साल तक इसका इलाज चला, लेकिन उनकी आंख कभी नॉर्मल नहीं हो सकी। इस दुर्घटना के बाद ललिता पवार की एक आँख पहले ही तरह पूरी तरह नहीं खुलती थी जिसकी वजह से उन्हें हिरोइन के बजाय चरित्र भूमिकाएं ही ऑफर की जाने लगीं।

हालांकि ललिता पवार ने चरित्र भूमिकाओं में भी अपनी अमित छाप छोड़ी। रामानंद सागर के टीवी धारावाहिक रामायण में मंथरा की भूमिका में ललिता पवार ने टीवी इतिहास में भी अपनी जगह पक्की करा ली।

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