भगवान दादा के अलबेला डांस के लिए गणपति भी रुकते थे भगवान दादा के दरवाजे पर

जन्मदिन विशेष

भगवान दादा की पहचान मोटामोटी दो हिस्सों में बंध गई हैं। एक ओर उन्हें अमिताभ बच्चन के आइकॉनिक डांस का जनक माना जाता है। दूसरी तरफ उनकी कहानी फिल्मी सितारों के अर्श से फर्श तक पहुंचने के एक बड़े उदाहरण के रूप में सुनाई जाती है। दादा की ये दोनों पहचानें अपनी-अपनी जगह पर बिलकुल पुख्ता हैं। मगर हिंदी सिनेमा में बहुत कुछ ऐसा है जिसकी नींव भगवान दादा की रखी हुई है।

भगवान दादा को शोहरत चमत्कार की तरह मिली और उसी तरह से रूठी भी। उनकी फिल्मों के गोदाम में आग लग गई। लगभग सारी फिल्में जलकर खाक हो गईं। अलबेला बच गई। क्योंकि उसका प्रिंट वो पहले ही गिरवी रख चुके थे। देखते ही देखते दादा दादर की उसी चॉल में वापस आ गए।

1913 में जब दादा साहब फाल्के ‘राजा हरिश्चंद्र’ के जरिए हिंदुस्तान में सिनेमा की नींव रख रहे थे। दादर की एक चॉल में एक मजदूर के घर भगवान आभाजी पालव ने पहली किलकारी भरी। सिनेमा के साथ उनकी ये जुगलबंदी पैदाइशी थी।

इसीलिए प्राइमरी के बाद पढ़ाई छोड़ दी। 5 फुट के छोटे के कद में कसरत से खूब जोर भरा और चॉल के दादा कहलाने लगे। ‘अलबेला’ ने दादा को खूब शोहरत दिलवाई। ‘अलबेला’ के बाद ‘लाबेला’ और ‘झमेला’ असफल हो गईं।

‘सहमे हुए सपने’ ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगी। इसके बाद आई ‘हंसते रहना’ को बनाना भगवान दादा के करियर की सबसे बड़ी गलती साबित हुई।

नायक किशोर कुमार के नखरे और तमाम अन्य वजहों से फिल्म पूरी नहीं हो पाई। घर, गाड़ी, बीवी के गहने सब कुछ बिक गया पर फिल्म नहीं बिक पाई। इसके साथ ही सिनेमा में भी बदलाव का दौर शुरू हो चुका था।

60 के दशक की कलात्मक सोबर रोमांस में अलबेला की मस्ती को थोड़ा आउटडेटेड बना दिया था। दादा इस बदलाव को समझने में थोड़ा सा पीछे रहे। रही सही कसर उनकी शराब की लत और बेहिसाब खर्चों ने पूरी कर दी।

दादर की उस चॉल ने अपने भगवान दादा को उसी प्रेम के साथ अपनाया। फिल्मों के जानकार और समीक्षक गजेंद्र सिह भाटी बताते हैं। हर साल दादर के गणपति विसर्जन के समय थोड़ी देर के लिए विसर्जन दादर की उस चॉल के सामने रुकता था। दादा बाहर निकलकर अपना सिग्नेचर डांस करते थे, फिर विसर्जन आगे बढ़ता था।

भगवान दादा बचपन की ट्रेनिंग से पहलवान थे। जिंदगी के दांव से पटका खाने के बाद भी हारना उन्होंने नहीं सीखा था। सी रामचंद्र, हेमंत कुमार और आनंद बख़्शी को सिनेमा में लेकर आने वाले दादा को अपने लिए काम मांगना पड़ा क्योंकि सिनेमा ही एक काम था जो भगवान दादा को आता था।

पुराने जमाने की दोस्ती के जरिए दादा को छोटे-मोटे किरदार मिलते रहते थे। तमाम मुश्किलों के बाद भी दादा 1995-96 तक फिल्मों में सक्रिय रहे।

65 साल लंबी फिल्मी पारी के आखिरी सालों में भगवान दादा को गोविंदा, सलमान खान के साथ पर्दे पर हमने आपने देखा ही होगा, मुमकिन है पहचान न पाए हों। जैसे सलमान खान को स्टार बनाने वाली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ के टाइटल सॉन्ग में सलमान के बगल में लाल पगड़ी वाले भगवान दादा हैं।

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