मैं हमेशा से अपनी फिल्मों के माध्यम से मातृभाषा को बढ़ावा देना चाहता हूं: नितिन चंद्रा

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, फिल्म निर्माता और निर्देशक नितिन चंद्रा ने कहा है कि वह हमेशा अपनी फिल्मों के माध्यम से मातृभाषा संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा देना चाहते हैं। नितिन चंद्रा सोमवार को मुंबई में मीडिया से बातचीत की। बिहार के रहने वाले नितिन चंद्रा ने भोजपुरी में ‘देसवा’ बनाई थी जो की गोवा में होने वाले भारतीय अंतर राष्ट्रीय फिल्म समारोह के इंडियन पैनोरमा में चुनी गयी थी। उनकी दूसरी फिल्म ‘मिथिला मखान’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

नितिन चंद्रा ने कहा कि वह हमेशा अपनी फिल्मों के माध्यम से मातृभाषा संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा देना चाहते हैं, उनका कहना है की, “मैं हमेशा से इसी तरह फिल्मों के माध्यम से अपने क्षेत्र में मातृभाषा, संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा देना चाहता था। जिस प्रकार अन्य राज्यों के फिल्म निर्माता और कलाकार अपने स्थानीय साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देते हैं और जिससे एक बाज़ार का विस्तार होता है और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार खड़ा होता है।” नितिन चंद्र बिहार के एकमात्र फिल्मकार हैं, जिसने बिहार में स्थानीय लोगों के साथ बिहार की भाषा में बिहार में फिल्म बनाकर 2016 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता।

नितिन चंद्रा ने कहा कि फिल्में सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का सबसे बड़ा रूप हैं, “मुझे लगा कि मैं फिल्मों के माध्यम से अपने क्षेत्र को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी ले सकता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि आज के परिवेश में सिनेमा उतना ही ज़रूरी है जितना साहित्य हुआ करता था। आज जब हम तमिलनाडु के बारे में बात करते हैं तो लोग रजनीकांत को याद करते हैं या अगर हम पश्चिम बंगाल के बारे में बात करते हैं, तो लोग सत्यजीत रे के बारे में बात करते हैं लेकिन जब भोजपुरी सिनेमा की बात होती है तो सब बगले झाँकने लगते हैं। फिर हमने  ‘बेजोड’ नाम से एक YouTube चैनल शुरू किया और अब, उस चैनल को दर्शकों द्वारा सराहा जा रहा है। हमने इसके लिए मुश्किल से 40-50 वीडियो बनाए हैं, लेकिन हमारे करीब 50-55 हजार सदस्य हैं और लगभग एक करोड़ व्यूस हैं। ”

भाषा हर समाज की पहचान है और भाषा को खराब करके हम कभी भी उस क्षेत्र के आर्थिक या सांस्कृतिक विकास नहीं कर सकते। नितिन चंद्र ने सोनू निगम, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान, मीका सिंह, हरिहरन, सुरेश वाडकर और स्वानंद किरकिरे जैसे गायको के साथ भोजपुरी मैथिलि में काम किया है। बेजोड़ का पहले नाम निओबिहार था, आज बेजोड़ चैनल से लोग देश विदेशों से जुड़े रहे हैं। जैसे जैसे बेजोड़ चैनल पे वीडियो बढ़ रहीं हैं, सिर्फ बेजोड़ का ही नहीं बल्कि भोजपुरी में अच्छी छवि बनती जा रही है।

चंद्रा ने यह भी कहा कि यह जिम्मेदारी फिल्म निर्माताओं और उन लोगों पर है जो अपनी मातृभाषा की स्थिति या सामान्य राय को आकार देना और सुधारना चाहते हैं। आश्चर्य की बात है की बिहार जैसे ऐतिहासिक राज्य का सिनेमा और संगीत आज सम्मानजनक स्थिति में नहीं है |

“फिल्म निर्माता प्रकाश झा और अनुराग कश्यप भोजपुरी क्षेत्रों से हैं और वो चाहें तो रातो रात भोजपुरी सिनेमा की स्थिति बदल सकते हैं। मुझे लगता है कि वे अभी भी भोजपुरी सिनेमा को बचा सकते हैं। दक्षिण, मराठी, पंजाबी और बंगला क्षेत्र की फिल्म निर्माताओं ने अपने स्वयं के सिनेमा पर ध्यान केंद्रित किया है।”

जब तक देश की भाषाओं का विकास नहीं होगा देश का सम्पूर्ण विकास संभव ही नहीं है।

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